लियोनार्डो दा विंची Leonardo da Vinci

लियोनार्डो दा विंची Leonardo da Vinci
लियोनार्डो दा विंची Leonardo da Vinci

लियोनार्डो दा विंची(Leonardo da Vinci)

इटली में चरम पुनरुत्थान के तीन फ्लोरेंस वासी कलाकार प्रमुख हैं: – लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) , माइकल एंजेलो तथा  रैफेलइनमें लियोनार्दो केवल कलाकार ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व की एक महान विभूति हो गया है

उसकी बौद्धिक क्षमता इतनी अधिक थी की उसने शरीर शास्त्र, अंतरिक्ष विद्या तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में उन संभावनाओं की कल्पना कर ली थी जिन पर आगे चलकर सफल अनुसंधान किया गया उसकी रुचियां और कार्य क्षेत्र की विविधता का अनु मान इसी से लगाया जा सकता है

की उसने जिन अनेक कार्य को आरंभ किया उनमें से बहुत कम को पूर्ण कर पाया शरीर में रक्त के परिभ्रमण की खोज उसी ने की थी युद्ध के है तू ससस्त्र गाड़ी की अविष्कार भी उसी ने किया था अनेक प्रकार के वायु या नो तथा हेलीकॉप्ट रो के निर्माण की योजना बनाई थी तथा पनडुब्बी की कल्पना की थी किंतु इनमें से वह किसी भी खोज को पूर्ण नहीं कर पाया

उसने हजारों रेखा – चित्र बनाएं, अनेक चित्र रंगे किंतु केवल थोड़े से चित्रों को पूर्ण कर सका उसकी कृतियों में अदृश्य के दर्शन की लालसा दृष्टिगोचर होती है

यद्यपि उसने धार्मिक चित्र बनाए हैं पर वह स्वयं धार्मिक न था उसे प्राचीन यूनानी मोतियों की श्रेष्ठता का विचार करने की भी चिंता न थी और उसके लिए वे प्रकृति की जूठन थी

उसे भौतिक जीवन से विशेष प्रेम था और वैज्ञानिक विश्लेषण के पश्चात ही वह वस्तुओं की सुंदरता का चित्रण करता था यद्यपि उसने तेल – चित्रण बहुत किया तथापि टेक्निक की दृष्टि से वह अपने युग से आगे नहीं बढ़ सका बहुत कम काम करने पर भी मिलान तथा फ्लोरेंस के अनेक कलाकारों ने उसका अनुकरण किया

उसने कला को धार्मिक पक्षपात – रहित स्तर पर उतारा और कलाकार का सामाजिक आदर बढ़ाया उसकी दृष्टि में कलाकार व्यवसाय न होकर न्याय, सत्य आदि सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा करता है

लियोनार्दो फ्लोरेंस के एक वकील का अवैध पुत्र था अवैध पुत्र था उसका जन्म विंची में हुआ था आरंभ में उसने वेरोचियो प्रसिद्ध मूर्ति शिल्पी दोनातेलो का  शिष्य था कहा जाता है

कि लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने उसके साथ बपतिस्मा के एक चित्र में बायी और का देवदूत चित्रित किया तोवेरोचियो ने चित्रांकन करना ही छोड़ दिया 1476 तक वहवेरोचियो के साथ रहा इसके पूर्व 1472 मैं ही वह चित्रकारों के संघ का सदस्य बन चुका था और1473 मैं एक दृश्य – चित्र बना चुका था

इस दृश्य – चित्र से पृथ्वी की रचना में उसकी रूचि का पता चलता है वस्त्रों की सिकुड़ना को नवीन ढंग से प्रस्तुत करने के संबंध में भी उसमें अनेक प्रयोग किए थे म्युनिख के मेडोना चित्र में उसने तेल चित्रण टेक्निक संबंधी नवीन प्रयोग किया है

इसमें दानेदार धरातल के पात्र पर ओस की बूंदे अंकित है जिन्होंने उसके समकालीन कलाकारों को आश्चर्य में डाल दिया था 1474 मैं उसने एक व्यक्ति चित्र अंकित किया हाथ भी दर्शाए गए थे

वेरोचियो भी हाथों में फूल लिए एक महिला का इसी प्रकार का एक चित्र बना चुका था और इसी परंपरा में लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci)  ने आगे चलकर मोनालिसा नामक विश्व प्रसिद्ध चित्र अंकित किया 1481 ई के लगभग उसकी पर्याप्त ख्याति हो गई क्योंकि उसे फ्लोरेंस के निकट ईसाई संतों में 1 मठ में राज्य अधिकारियों द्वारा ईशा की वंदना विषय के चित्रण हेतु आमंत्रित किया गया

इस चित्र में सभी विशेषताएं मिलते हैं जो 15 वीं सदी के अंत में कलाकार लक्ष्मण बन चुकी थी चित्र का संयोजन पिरामिड के समान पास ठोस है उसमे गहराई भी है  आओ गतिशीलता भी यह चित्र पूर्ण नहीं हो पाया यद्यपि इससे संबंधित अनेक स्केच उसने बनाएं

1483 मैं वह मिलान पहुंचा 30 वर्ष की आयु में मिलान के ड्यूक को उसने एक पत्र भेजा था जिसमें 1 सैनिक, इंजीनियर, मूर्तिकार, दरबारी , नगर – योजक आदि अनेक दृष्टि से उसने अपनी योग्यता का परिचय दिया था और ड्यूक के दरबार में नौकरी की प्रार्थना की थी

मिलान पहुंचकर उसने श्वेत रोम  युक्त कोट वाली महिला का चित्र अंकित किया इस चित्र में अंकित युवती निश्चय ही ड्यूक की पत्नी है सेल खंडो की कुमारी शीर्षक से उसने जो दो चित्र अंकित किए थे उनके संबंध! मैं यह धारणा है कि उन्हें एक साथ आरंभ किया गया था

किंतु वास्तव में पेरिस संग्रह वाला चित्र पहले और नेशनल गैलरी लंदन वाला चित्र बाद में अंकित किया गया था क्योंकि पहले चित्र में फ्लोरेस की परंपरागत शैली का अधिक प्रभाव है

लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने कुमारी मेरा लिड़ातथा हंस के प्राचीन आख्यान के आधार पर भी चित्रांकन किया था उसके ऐसे दो चित्र और लिडा और हंस के नाम से विख्यात है इनके आधार पर एक रेखा चित्र रे फेल ने भी बनाया था

लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci)  मिलान में 1499 तक रहा प्रधानत: वह ड्यूक के यह दरबार की विभूति के रूप में रहामिलान के ही एक उपासना – ग्रह में उसने ईशा का अंतिम भजन (द लास्ट सुपर) नामक चित्र आरंभ किया

1497 ईस्वी मैं वह इस पर कार्य कर रहा था एक तो वह बहुत धीरे-धीरे कार्य करता था दूसरे उसनेफ फ्रेस्को के स्थान पर तेल पद्धति से प्लास्टर की भित्ति पर कार्य करने का प्रयोग आरंभ कियाथा – इन्हीं दिनों कारणों से यह चित्र स्वयं उसके सामने ही दीवार पर से उखड़ने लगा था

चरम पुनरुत्थान कालका यह ऐसा प्रथम चित्र है जिसमें तनावपूर्ण स्थिति और ईशा के शिष्य की मुखा कृतियों की मनोवैज्ञानिक ता पर बल दिया गया हे 15 वीं सदी में फ्लोरेंटाइन चित्रकला

इस प्रकार के विषयों तथा परिस्थितियों के चित्रण से अनभिज्ञ थी लियोनार्दो के पश्चात की पीढ़ी ने यह स्वीकार किया कि कलाकार विचारक होने के नाते दार्शनिक से किसी प्रकार कम नहीं होता और वह ऐसा कारीगर मात्र नहीं

जो धन के बदले कुछ निश्चित क्षेत्र में प्रतिदिन रंग भरे इसी प्रकार लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) की कलाकी पर्याप्त प्रशंसा की गई हैं वास्तव में लियोनार्दो ने कलाकार की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में बहुत योग दिया है

1499 मैं मिलान पर फ्रेंच अधिकार हो गया और लियोनार्दो फ्लोरेंस लौट आया 1502 – 3 मै वह सीजर बोर जिया का सैनिक इंजीनियर रहा इस समय शव – ग्रहों में जाकर उसने अनेक शवो का अध्ययन किया जिसके फलस्वरूप वह अपने समय का सर्वश्रेष्ठ शरीर विद कहा जाने लगा इसी समय उसे

माइकेल एंजिलो के साथ फ्लोरेंस किविजो की स्मृति स्वरूप युद्ध – दृश्य के दो विशाल भित्ति – चित्र अंकित करने को कहां गया दोनों कलाकारों में अनबन रहती थी और वे एक दूसरे को चाहते भी नहीं थे फल त: यह चित्र भी पूर्ण न हो सके लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci)  ने प्राचीन मॉम – चित्रण की पद्धति का भी प्रयोग किया

जिसमें वह असफल रहा 1503 मैं आरंभ हुआ यह कार्य 1505 मैं रोक दिया गया इसी अवधि में वह दो वेस्को एक या दो शिशुओं के चित्रण द्वारा संश्लिष्ट संयोजन के प्रयोग करता रहा यह चित्र पर प्राय: मेडोना तथा शिशु ईसा के हैं जिनमें कोई संत साथ – साथ चित्रित है इस प्रकार के केवल दो चित्र (संभवत प्रथम और अंतिम) ही अवशिष्ट है

1500 – 1504 के मध्य ही उसने फ्लोरेंस के एक अधिकारी की पत्नी का व्यक्ति – चित्र अंकित किया यही विश्व प्रसिद्ध मोनालिसा है इस नारी के विषय में अनेक प्रकार की बातें कही जाती है और

चित्र में अंकित इसकी मुस्कान भी मुस्कान भी रहस्य पूर्ण – सी लगती है तकनीकी दृष्टि से आंखों तथा होठों की रेखाएं बार – बार खींचने से मुस्कान का यह प्रभाव स्वयं ही उत्पन्न हो गया है तेल पद्धति का मैं उत्कृष्ट प्रयोग और छाया –  प्रकाशके धूम प्रभाव हेतु यह चित्र? दृष्टि वे है

लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) का विचार था की छाया तथा प्रकाश परस्पर मिले हुए होने चाहिए उनके मध्य किसी   सीमा – रेखा का आभास ना हो यह चित्र मुखाकृति की शीलता का आदर्श माना जाता है

1506 में लियोनार्द पुनः मिलान गया उसके अंतिम वर्ष वैज्ञानिक सौदों में व्यतीत 1507 में उसने संत जॉन का एक चित्र बनाया इस चित्र में लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) के दोष उभर कर आ गए हे घनत्व उत्पन्न करने की परवर्ती के कारण चित्र में छाया काले रंग के समान हो गई है

छाया – प्रकाश को महत्व दिया गया है अतः रंग का महत्व पूर्णत: समाप्त हो गया है भावा अभिव्यंजना की सुख क्षमता बरसाने के प्रयत्न में मुख आकृतियों में बनावटी पन आ गया है उसने जो अनेक रेखाचित्र बनाए थे उनका संग्रह करके प्रवृत्ति कला विदो ने एक पुस्तक भी प्रकाशित कर दी हैं

लियोनार्दो ने अपने शिक्षक की गर्डन शीलता को छोड़कर कोमल छाया – प्रकाश की पद्धति को अपनाया था जो सीमा रेखा को महत्वहीन कर देती थी यह कोमल प्रकाश लगभग संध्याकाल जैसा है

जिसमें रेखीय परिप्रेक्ष्य के स्थान पर वायवीय परिप्रेक्ष्य को वरीयता दी गई संत जेरोम तथा मैं जाई की वंदना आदि कुछ चित्रों को छोड़कर उसका सारा कार्य एक रंगे प्रभाव के समान लगता है लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci)  उच्च मानसिक भाव भूमि वाला व्यक्ति था

उसके मन में कभी कोई दूर विचार नहीं आया वह सभी स्त्रियों को देवी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति मानता था चाहे वह सेल खंडो की कुमारी हो मोनालिसा हो अथवा लीडा होअनावृत आकृतियों के अध्ययन हेतु वह प्राय: मुर्दा घरों का उपयोग करता था या कभी-कभी दरबारी गणिका ओं को भी चित्रित करता था

इसके अतिरिक्त उसने दृश्य चित्र भी बनाएं थे और फूलों के भी लघु चित्र अंकित के थे उसने पूरे नगरों के विन्यास मान – चित्र भी तैयार किए थे और युद्ध के शास्त्रों के भी कई रूप बनाए थे स्प्रिंग से चलने वाले वायुयान तथा सैनिक इंजनों से युक्त  टैंक के डिजाइन भी, जो उस युग से लगभग 5 सो वर्ष आगे की भविष्य के समय की बात थी उसने तैयार किए थे

मारवाड़ चित्र शैली marwar style of painting

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