राजस्थान में 1857 की क्रांति rajasthan me 1857 ki kranti

राजस्थान में 1857 की क्रांति rajasthan me 1857 ki kranti

अंग्रेजी सरकार ने 1832 में सभी राजपूत रियासतों को मिलाकर राजपूताना एजेंसी का गठन किया था और मुख्यालय अजमेर बनाया था

राजपूताना एजेंसी पर नियंत्रण रखने के लिए 1832 में ही AGG (Agent to governer general) का सृजित किया गया और राजपूताना का पहला AGG लॉकेट को बनाया गया

1857 की क्रांति के दौरान राजपूताना का AGG पैट्रिक लॉरेंस था 1845 में राजपूताना एजेंसी का मुख्यालय माउंट आबू स्थानांतरित कर दिया गया
AGG के नियंत्रण में रियासतों में पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किए जाते थे

1857की क्रांति के दौरान राजपूताना में निम्न 6 पोलिटिकल एजेंट थे

रियासत – पोलिटिकल एजेंट
कोटा – बर्टन
जोधपुर – माक्स मेशन
उदयपुर – सावर्स
जयपुर – ईडन गार्डन
भरतपुर – मॉरीसन
सिरोह – जे. डी. हॉल

क्रांति के दौरान 2 पॉलिटिकल एजेंट मारे गए थे ( बर्टन,माक्स मेशन)

1857 की क्रांति के दौरान राजपूताना में निम्न 6 सैनिक छावनीया थी जिनमें सर्वप्रथम 1818 मैं नसीराबाद में छावनी स्थापित की गई
नसीराबाद (अजमेर), नीमच(M.P.), देवली( टॉक), एरिनपुरा( पाली), खेरवाड़ा( उदयपुर), ब्यावर( अजमेर)
ब्यावर और खेरवाड़ा की छावनी ने 1857 की क्रांति में भाग नहीं लिया था
ब्यावर छावनी की स्थापना 1822 में हुई थी जब की क्रांति के समय यहां मेर रेजीमेंट नियुक्ति थी

खेरवाड़ा छावनी की स्थापना 1840 – 41 में हुई जब की क्रांति के समय यहां भील कोर नियुक्त थी जिसे मेवाड़ भील कोर भी कहा जाता था इसका मुख्यालय खेरवाड़ा में था

राजस्थान में क्रांति के केंद्र –

1. नसीराबाद – राजस्थान में 1857 की क्रांति का आरंभ 28 मई 1857 को नसीराबाद से हुआ जिसका नेतृत्व बख्तावर सिंह ने किया था नसीराबाद में पहला विद्रोह 15 N.I (नेटिव इन्फेंट्री) और इसके बाद 30N.I ने किया नसीराबाद के सैनिक विद्रोह करके 18 जून को दिल्ली पहुंचे नसीराबाद में न्यूबरी स्पोटिसवूड नामक अंग्रेज मारे गए थे क्रांति के समय नसीराबाद छावनी का प्रभारी आई. टी. प्रिचाड्र था जिसने अपनी पुस्तक दी म्यू रीनी इन राजपूताना मैं नसीराबाद के विद्रोह का आंखों देखा हाल लिखा है

2. नीमच – नीमच छावनी में विद्रोह 3 जून 1857 मोहम्मद अली बैग और हीरा सिंह के नेतृत्व में हुआ था नीमच में विद्रोह से पूर्व वहां के प्रभारी एंबार्ट ने नीमच के सैनिकों को ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने की शपथ दिलवाई थी परंतु मोहम्मद अली बैग नामक सैनिक ने यह कहते हुए शपथ लेने से इंकार कर दिया कि “अंग्रेजों ने भी अवध का विलय करके अपनी शपथ भंग की है इस कारण उन्हें हम से शपथ पालन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए” नीमच में दो बार विद्रोह हुआ था जिसे सावर्स ने दबाया था

3. अजमेर – क्रांति के समय अजमेर की स्थिति महत्वपूर्ण थी क्योंकि यहां अंग्रेजों का शस्त्रागार और खजाना था फिर भी 9 अगस्त 1857 को अजमेर की जेल में विद्रोह हुआ जहां से 50 केदी फरार हो गए

4. टोक – क्रांति के समय टोक राजपूताना की एकमात्र मुस्लिम रियासत थी क्रांति के समय यहां के नवाब वजिरूछोला थे टोंक में क्रांति वहां की सेनापति मीर आलम खा के नेतृत्व में हुई थी मोहम्मद मुजीब के नाटक आजमाइश के अनुसार टोंक के विद्रोह में महिलाओं ने भी भाग लिया था

5. धौलपुर – देवा गुर्जर के नेतृत्व में 3000 गुर्जरों और जाटों ने विद्रोह करके धौलपुर पर अधिकार कर लिया परंतु पटियाला महाराजा की सहायता से इस विद्रोह को दबा दिया गया धौलपुर के विद्रोह ने इरादत नगर के खजाने को भी लूट लिया था

6. जयपुर – क्रांति के समय जयपुर का शासक राम सिंह द्वितीय था जिसे क्रांति में अंग्रेजों का सहयोग करने के कारण सितार- ए – हिंदू की उपाधि दी गई थी जयपुर में विलायत खा और सादुला खा ने क्रांति की योजना बनाई थी परंतु इन्हें क्रांति से पूर्व ही गिरफ्तार करने के कारण जयपुर में क्रांति नहीं हो सकी

7. भरतपुर – भरतपुर के निकट स्थित टूडल तैनात एक सैनिक टुकड़ी ने विद्रोह करके भरतपुर पर अधिकार कर लिया था परंतु इस विद्रोह को मॉरिसन ने दबा दिया

8. बूंदी – 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के प्रति क्षत्रिय सहयोग की भूमिका रही केवल बूंदी के शासक रामसिंह ही राजपूताना के ऐसे शासक थे जिन्होंने क्रांति में अंग्रेजों का सहयोग नहीं किया था

9. बीकानेर – क्रांति के समय बीकानेर के शासक सरदार सिंह एकमात्र ऐसे ही शासक थे जिन्होंने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की ओर करने के लिए राजपूताना से बाहर पंजाब की बाडलू गांव तक अपनी सेना लेकर गए थे

10. उदयपुर – उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह ने क्रांति में अंग्रेजों का सबसे पहले और सबसे ज्यादा सहयोग किया था

11. आऊवा (पाली) – क्रांति के समय आऊवा जोधपुर रियासत का एक ठिकाना था आऊवा के ठिकाने दार कुशाल सिंह चंपावत थे जो अंग्रेजों के विरोधी थे जबकि जोधपुर तख्त सिंह अंग्रेजों का समर्थक था एरिनपुरा और जोधपुर रीजन के सैनिकों को 21 अगस्त 1857 को माउंट आबू में विद्रोह कर दिया और दिल्ली चलो मारो फिरंगी का नारा देते हुए दिल्ली की तरफ रवाना हुई

जोधपुर रीजन की स्थापना 1835 में जोधपुर महाराजा मानसिंह ने की थी जिसमें 1500 से नहीं थे  कुशाल सिंह ने इन विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व करके आऊवा मैं विद्रोह कर दिया आऊवा के इस विद्रोह को दबाने के लिए मीनार सिंह के नेतृत्व में जोधपुर की ओर हेथकोड के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना आई थी परंतु

8 सितंबर 1857 को कुशाल सिंह को चित्तौड़ के युद्ध में इन्हें पराजित कर दिया आऊवा के विद्रोह को दबाने के लिए पैट्रिक लॉरेंस और मेक मोशन भी आए थे परंतु मेक मोशन को मार कर आवा के किले के बाहर पेड़ पर लटका दिया

कुशाल सिंह ने 18 सितंबर 1857 को चेलावास के युद्ध में पैट्रिक लॉरेंस को पुनः पराजित कर दिया इस युद्ध को मारवाड़ के लोकगीतों में काले गोरे का युद्ध कहा जाता है कहा जाता है कि क्रांति के दौरान आऊवा वासियों ने अंग्रेजों को 6 बार पराजित किया था पराजित होने के बाद पैट्रिक लॉरेंस ने होम्स नाम के सेनापति को आऊवा भेजा था

परंतु होम्स के आऊवा पहुंचने से पूर्व ही एरिनपुरा के सैनिक दिल्ली की ओर जा चुके थे और कुशाल सिंह भी आऊवा का किला अपने भाई पृथ्वी सिंह को सौंप कोणरिया के ठाकुर जोध सिंह की शरण में चला गया क्रांति के दौरान कुशाल सिंह को निम्न ठिकानों दारो ने सहयोग दिया

1.कोणरिया – जोध सिंह
2. सलूंबर – केसरी सिंह
3. अलीनिया वास – अजीत सिंह
4. गूलर – बिशन सिंह
5. असोप – शिवदान सिंह

जनवरी 1857 मैं होम्स ने आऊवा के विद्रोह का दमन करके आऊवा पर अधिकार कर लिया और वहां से 13 तोपे तथा सुगाली माता की मूर्ति लूटकर अजमेर ले आया यह मूर्ति 10 सिर 54 हाथों वाली है यह वर्तमान में पाली संग्रहालय में रखी हुई है यह कुशाल सिंह चंपावती की कुलदेवी थी इसे क्रांतिकारियों की देवी भी कहा जाता है

कुशाल सिंह ने 1860 में अंग्रेजी सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया कुशाल सिंह की क्रांति में भूमिका की जांच करने के लिए मेजर टेलर आयोग गठित किया गया था जिसमें कुशाल सिंह को बरी कर दिया कुशाल सिंह की उदयपुर में 1864 मैं मृत्यु हो गई

11. कोटा का विद्रोह – 1857 की क्रांति के समय कोटा के शासक रामसिंह द्वितीय थे जबकि पोलिटिकल एजेंट मेजर बटन थे कोटा में क्रांति 15 अक्टूबर 1857 को जय दयाल और मेहरान खा के नेतृत्व में हुई थी जय दयाल गोकुल का निवासी था जबकि मेहरान खा करौली का निवासी था

कोटा में क्रांति नारायण भवानी नामक सैनिक टुकड़ियों ने की थी क्रांतिकारियों ने कोटा पर अधिकार कर के राम सिंह द्वितीय को उसके महल में नजर बंद कर दिया गयाक्रांतिकारियों का कोटा पर लगभग 6 महीने तक अधिकार रहा जो पूरे भारत में सबसे ज्यादा है

करौली के शासक मदन पाल ने भी रामसिंह द्वितीय की सहायता के लिए कोटा एक सेना भेजी थी

क्रांतिकारियों ने कोटा में डॉक्टर सेलदर और सेविल काण्ठम की हत्या कर दी क्रांतिकारियों ने बटन और उसके पुत्रों आर्थर तथा फ्रेंक की भी हत्या कर दी
बर्टन का सिर काट कर उसका जुलूस निकाला गया और उसे रामपुरा कोतवाली में ले जाकर तोप से उड़ा दिया

कोटा मथुराधीश के महंत कन्हैयालाल जी महाराज की मध्यस्था से रामसिंह द्वितीय और कोटा के क्रांतिकारियों के मध्य एक समझौता हो गया जिसके अनुसार कोटा में हुई क्रांतिकारी की जिम्मेदारी रामसिंह द्वितीय पर डाली गई
H. G. रानर्स ने 30 मार्च 1857 को कोटा का विद्रोह दबाकर जय दयाल और मेहरान खा गिरफ्तार कर लिया तथा इन पर देवली की छावनी में मुकदमा चलाया गया

मेहरान खा 1859 मैं और जय दयाल को 1860 में कोटा में फांसी दे दी गई
रामसिंह द्वितीय की क्रांति में भूमिका की जांच करने के लिए H.G.रानर्स की अध्यक्षता में रानर्स आयोग गठित किया था जिसमें कोटा में हुई क्रांति के रामसिंह द्वितीय को जिम्मेदार माना था

इसी कारण अंग्रेजी सरकार ने रामसिंह द्वितीय की तोपों की सलामी लेने की संख्या 15 से घटाकर 11 कर दी

नाना साहब – कहा जाता है कि क्रांति के दौरान नाना साहब कोठारिया के ठाकुर जोध सिंह की शरण में आए थे और कोणरिया में ही इनकी मृत्यु हो गई थी
क्रांति के दौरान राजपूताना के शासक

रियासत – राजा
धौलपुर – भगवंत सिंह
जैसलमेर – रणजीत सिंह
डूंगरपुर – उदय सिंह
अलवर – बन्ने सिंह
बीकानेर – सरदार सिंह
भरतपुर – जसवंत सिंह
कोटा – रामसिंह द्वितीय
जयपुर – रामसिंह द्वितीय
बूंदी – राम सिंह
सिरोही – शिव सिंह
झालावाड़ – पृथ्वी सिंह
बांसवाड़ा – लक्ष्मण सिंह
करौली – मदन सिंह
टोंक – वजीर उछोला
उदयपुर – स्वरूप सिंह
जोधपुर – तक्त सिंह

तात्या टोपे – ग्वालियर के पराजित होने के बाद तात्या टोपे 8 अगस्त 1858 को मांडलगढ़ होते हुए भीलवाड़ा आए थे परंतु 9 अगस्त 1858 को कोटेश्वरी के युद्ध में H.G. रोनर्स ने तात्या टोपे को पराजित कर दिया क्रांति के दौरान तात्या टोपे ने टोंक, झालावाड़ और बांसवाड़ा रियासतों पर अधिकार कर लिया था तथा झालावाड़ के शासक पृथ्वी सिंह से 20 लाख की आर्थिक सहायता मांगी थी

क्रांति के दौरान तात्या टोपे जैसलमेर के अतिरिक्त राजपूताना की सभी रियासतों में गए थे तात्या टोपे उनके एक साथी मानसिंह नरूका द्वारा विश्वासघात करने के कारण 8 अगस्त 1859 को कोटा के निकट गिरफ्तार कर लिया गया 18 अगस्त 1859 सिप्री स्थान पर फांसी दे दी गई

तात्या टोपे के फांसी के बारे में शोकर्स ने कहा था कि तात्या टोपे की फांसी को अंग्रेजी सरकार का बड़ा अपराध समझा जाएगा आने वाली पीढ़ियां पूछेगी कि इस अपराध की अनुमति किसने दी और इसकी पुष्टि किसने की

अमर चंद भाटिया – अमर चंद भाटिया को राजस्थान में 1857 की क्रांति का पहला शहीद माना जाता है अमर चंद भाटिया बीकानेर के निवासी थे और इन्हें 22 जून 1857 को ग्वालियर में फांसी दी गई थी अमर चंद भाटिया को नगर सेठ भी कहा जाता था इन्होंने 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की आर्थिक सहायता की थी इस कारण इन्हें राजस्थान में 1857 की क्रांति का भामाशाह कहा जाता है

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