राजस्थान के किसान आंदोलन

राजस्थान के किसान आंदोलन Farmer Movement of Rajasthan

किसान आन्दोलन

बिजोलिया किसान आंदोलन (1897 – 1941)

  • इसे भारत का पहला अहिंसात्मक किसान आंदोलन माना जाता है बिजोलिया वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में स्थित ऊपर माल की जागीर गांव था इस जागीर का संस्थापक अशोक परमार था जो 1′ 527 के खानवा  के युद्ध में राणा सांगा की ओर से लड़ने गया था
  • बिजोलिया का ठिकाने दार मेवाड़ रियासत के 16 उमराव मैं शामिल था मेवाड़ महाराणा की सलाह कारी परिषद सदस्यों को उमराव कहा जाता था इनकी संख्या 16 होने के कारण इन 16 उमराव कहते हैं
  • इस आंदोलन के प्रणेता साधु सीताराम दास थे इन्होंने इस आंदोलन को प्रारंभिक नेतृत्व किया था यह आंदोलन धाकड़ किसानों द्वारा किया गया था
  • इस आंदोलन की शुरुआत 1897 मैं गिरधरपुरा गांव में हुई थी जब किसानों के दो प्रतिनिधि नानजी पटेल और ठाकरी पटेल मेवाड़ महाराणा फतेह सिंह से मिलने उदयपुर गए थे
  • 1903 बिजोलिया के ठाकुर कृष्ण सिंह/ किशन सिंह ने किसानों पर चवरी नामक नया कर लगा दीया था जिसके अंतर्गत किसानों को अपनी लड़की के विवाह पर 5 रुपए (13 रुपए) ठिकाने में जमा कराने पड़ते थे
  • नए राव पृथ्वी सिंह ने 1906 मैं किसानों पर तलवारी बंधाई (उत्तराधिकारी शुल्क) और घुडपड़ी कर लगा दिया था
  • कहा जाता है कि इस समय मैं मेवाड़ में 84 प्रकार की लागबाग लागत (लगाने के अतिरिक्त शेष कर) प्रचलित थी
  • 1914 में चित्तौड़ में विद्या प्रचारिणी सभा का अधिवेशन था जिसमें विजय सिंह पथिक और हरि बाई किंकर भाग लेने आए थे सीताराम दास ने इसी समय पथिक को बिजोलिया आमंत्रित किया था
  • विजय सिंह पथिक 1916 में इस आंदोलन में जुड़ गए थे पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था यह बुलंद शहर के निकट गुठावली रहने वाले थे इन्हें 21 फरवरी 1915 को प्रस्तावित क्रांति में अजमेर क्षेत्र में क्रांति करने की जिम्मेदारी दी गई थी क्रांति का भंडाफोड़ होने के कारण भूप सिंह को गिरफ्तार कर टॉडगढ़ (ब्यावर) के किले में नजर बंद कर दिया यहां से फरार होकर इन्होंने अपना नाम विजय सिंह पथिक कर लिया
  • इस आंदोलन को गति देने के लिए पथिक ने 1917 में बिजोलिया के ऊमरपाल पंच बोर्ड का गठन किया था जिसका पहला सरपंच मन्ना पटेल को बनाया गया
  • पथिक ने कानपुर से प्रकाशित होने वाले प्रताप नामक समाचार पत्र के माध्यम से इस आंदोलन को देश भर में चर्चित कर दिया था
  • महात्मा गांधी ने अपने निजी सचिव महादेव देसाई को किसानों की समस्या जानने के लिए बिजोलिया भेजा था
  • 1919 में कांग्रेस अधिवेशन में बिजोलिया आंदोलन का प्रस्ताव रखा गया था
  • महाराणा फतेह सिंह ने 1919 में बिंदु लाल भट्टाचार्य की अध्यक्षता में एक आयोग मेवाड़ भेजा था जिसमें सीतारामदास और माणिक्य लाल वर्मा को रिहा करने की बात कही थी
  • पथिक ने 1919 में वर्धा (महाराष्ट्र) मैं राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की थी जिसे 1920 में अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया इसी संस्था ने इस आंदोलन का संचालन किया था
  • 11 फरवरी 1922 को राजपूताना के तत्कालीन ए. जी. जी . रोबोट होलेंड और बिजोलिया किसानों के मध्य एक समझौता हुआ था जिसके अनुसार बिजोलिया के किसानों पर लगाए जाने वाली 35 प्रकार की लाल – बाग समाप्त कर दी गई 1927 के बाद से इस आंदोलन का नेतृत्व पथिक ने फूसारिया (ग्वालियर के पास) (मध्य प्रदेश) से किया था
  • इस आंदोलन से माणिक्य लाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय, रामनारायण चौधरी, जमुनालाल बजाज इत्यादि जुड़े हुए थे
  • मेवाड़ के प्रधानमंत्री टी. विजय राघवाचारी जी के प्रयासों में यह आंदोलन 1941 में समाप्त हो गया

बूंदी किसान आंदोलन

  • इसे बरड किसान आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है इसके नेतृत्व करता प. नयनु राम शर्मा थे
  • इस आंदोलन के दौरान डाबी (बूंदी) नामक स्थान पर किसानों पर इकराम हुसैन नामक पुलिस अधिकारी द्वारा गोलियां चलाने से 2 अप्रैल 1923 को नानक भील देवा गुर्जर नामक किसान मारे गए थे
  • इस आंदोलन में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार भी किया

बेगू (चित्तौड़) किसान आंदोलन:

  • इस आंदोलन का नेतृत्व रामनारायण चौधरी ने किया था यह आंदोलन धाकड़ किसानों द्वारा किया गया था
  • बेगू का ठिकाने दार भी मेवाड़ रियासत के 16 उमराव में शामिल था
  • रामनारायण चौधरी द्वारा बेगू के ठाकुर अनूप सिंह पर दबाव डाले जाने पर 1923 में किसानों से परसोली (भीलवाड़ा) गांव में किसानों की मांगों को स्वीकार कर लिया गया परंतु ब्रिटिश सरकार ने इस समझौते को रद्द करते हुए इससे बोलशेविक फैसले की संज्ञा दी
  • बेगू किसानों की समस्याओं को जानने के लिए अंग्रेजी सरकार ने ट्रेंच कमीशन का गठन किया था ट्रेंच ने किसानों से मिले बिना ही रिपोर्ट पेस कर दी थी
  • प्रिंस की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए किसान गोविंदपुरा नामक स्थान पर एकत्रित हुए थे परंतु वहां ट्रेंच द्वारा गोलियां चलाने के कारण 13 जुलाई 1923 को रूपा जी धाकड़ और कृपा जी धाकड़ नामक किसान मारे गए

अलवर किसान आंदोलन:

  • अलवर के शासक जयदेव सिंह द्वारा जंगली सूअरों को मारने पर प्रतिबंध लगाने के लिए यह आंदोलन किया गया था
  • आंदोलन के दौरान अलवर का तीन चौथाई (3/4) भाग खालसा था
  • अलवर के किसानों ने 1925 में दिल्ली में एक सभा आयोजित की थी जहां से प्रकाशित पुकार नामक पुस्तिका मैं किसानों की समस्या का प्रकाशित किया गया था
  • अलवर में किसान अपनी समस्याओं को लेकर नीमूचणा नामक स्थान पर एकत्रित हुए थे परंतु जहां छाजू सिंह नामक अंग्रेजी कमांडर द्वारा गोलियां चलाने पर 14 मई 1925 को 100 से ज्यादा किसान मारे गए इस घटना को इतिहास में
  • नीमूचणा हत्याकांड के नाम से जाना जाता है
  • नीमूचणा हत्याकांड की देशभर में आलोचना की गई महात्मा गांधी ने इसे जलियांवाला बाग हत्याकांड जेसी घटना बताते हुए इसे दोहरी डायर शाही कहा था

मारवाड़ किसान आंदोलन:

  • अंग्रेजी सरकार द्वारा 1936 में मारवाड़ के किसानों पर 119 प्रकार की लागतो में कटौती करने की घोषणा की गई थी परंतु जागीरदारों द्वारा इसे लागू नहीं किया गया यही आंदोलन का कारण था इस आंदोलन का नेतृत्व मारवाड़ लोक परिषद द्वारा किया गया था जिसका गठन 1938 में रणछोड़ गट्टानी ने किया था
  • इस आंदोलन से जयनारायण व्यास भी जुड़े हुए थे जिन्हें मारवाड़ में राजनैतिक जनजागृति का जनक कहा जाता है
  • मारवाड़ के किसानों द्वारा 28 मार्च 1942 को चंडावल (पाली) नामक गांव में उत्तरदाई शासन
  • दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था परंतु यहां किसानों पर जागीरदारों की सेना द्वारा लाठीचार्ज किया गया इसे इतिहास में चंडावल की घटना कहाजाता है 1947 में भी चंडावल मैं किसानों पर लाठीचार्ज किया गया था
  • इस आंदोलन के दौरान मारवाड़ के किसान डाबड़ा (नागौर) नामक स्थान पर एकत्रित हुए थे जहां पर 13 मार्च 1947 को गोलियां चलाने के कारण निम्न किसान मारे गए – चुन्नी लाल शर्मा, पन्ना लाल चौधरी, अलका राम चौधरी,रुघा राम चौधरी

करौली किसान आंदोलन:

  • करौली महाराजा भीम बाल के शासनकाल में 1927 में कुंवर मदन सिंह द्वारा सूअरों की किसान आंदोलन चलाया गया

दूधवाखारा आंदोलन:

  • दुधवाखारा वर्तमान में चुरू जिले में स्थित है यह आंदोलन बीकानेर रियासत में चलाया गया था
  • दूधवाखारा के जागीरदार सूरजमल के अत्याचारों के विरोध में हनुमान सिंह और मघाराम वेध के नेतृत्व में यह आंदोलन चलाया गया था
  • सूरजमल ने हनुमान सिंह को अनूपगढ़ किले में कैद कर लिया था जहां उसने 65 दिनों तक भूख हड़ताल की थी

तौल आंदोलन:

  • मारवाड़ के जागीरदारों द्वारा तोल कटौती करके 100 तो ले के एक सेर के बजाय 80 तौल का एक सेर दिया गया था इसी वजह से 1920 – 22 के मध्य चांदमल सुराणा के नेतृत्व में मारवाड़ मैं आंदोलन चलाया गया था

मेव किसान आंदोलन:

  • हिंदू धर्म से परिवर्तित मुसलमान किसान मेव कहलाते हैं मेंवों द्वारा यह आंदोलन मेवात (अलवर – भरतपुर) मैं चलाया गया था इसके नेतृत्व करता मोहम्मद अली थे
  • अंजुमन खादिम उल इस्लाम नामक संस्था द्वारा 1932 में मेव किसानों की अनेक मांगे अलवर महाराज जय सिंह के सामने रखी गई थी सिंह ने इसकी जांच के लिए एक आयोग गठित किया था जिसका मेंवों ने विरोध किया इसी कारण इस आंदोलन ने सांप्रदायिक रूप ग्रहण कर लिया था
  • ब्रिटिश सरकार ने मेंवों की समस्याओं को जाने के लिए सेयद हुसैन बिलग्रमी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित करके अलवर महाराजा जय सिंह को अलवर से वृंदावन में निष्कासित कर दिया इस जय सिंह की पेरिस में मृत्यु हुई थी

सीकर/ शेखावटी किसान आंदोलन:

  • सीकर के ठाकुर कल्याण सिंह द्वारा की गई लगान वृद्धि विरोध मैं सीकर के जाट किसानों ने किसान आंदोलन किया था
  • सीकर जयपुर रियासत का भाग था इस आंदोलन का नेतृत्व ठाकुर देशराज द्वारा किया गया ठाकुर देशराज ने 1931 मैं राजस्थान जाट महासभा गठन किया था
  • 1925 में राम नारायण चौधरी ने लंदन मैं प्रकाशित समाचार पत्र डेली हेराल्ड मैं इस आंदोलन से संबंधित समाचार छापे थे जिस को आधार बनाकर पैट्रिक लॉरेंस ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमंस मैं सीकर के किसानों से संबंधित प्रश्न पूछा था
  • इस आंदोलन के दौरान 25 अप्रैल 1934 में किशोरी देवी के नेतृत्व में 10000 महिलाओं ने कटराथल (सीकर) सभा का आयोजन किया था
  • इस आंदोलन के दौरान जय सिंह पूरा नामक गांव में जून 1934 में ठाकुर ईश्वर सिंह द्वारा किसानों पर लाठी वार करवाया गया था जिसमें कुछ किसान मारे गए थे इस घटना को जय सिंह पूरा हत्याकांड के नाम से जाना जाता है इस हत्याकांड की चर्चा भी हाउस ऑफ कॉमन (ब्रिटेन) मैं की गई थी
  • इस आंदोलन के दौरान खुडी गांव में भी मार्च 1935 में अंग्रेजों द्वारा एक दूल्हे के साथ दुर्व्यवहार किया गया था जिसमें हुई झड़प मैं चार किसान मारे गए थे कुदण गांव में भी मई 1935 में वेब नामक अंग्रेज अधिकारी द्वारा कुछ किसानों को मरवा दिया गया था जिसे कुदण गांव हत्याकांड के नाम से जाना जाता है

भारत की जनसंख्या 

किसान आंदोलन

 

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