badami caves बादामी गुफाएं

बादामी गुफाएं (badami caves) (6 सदी ई. से 8 सदी ई.)

भौगोलिक स्थिति

बादामी गुफाएं (badami caves) कर्नाटक प्रान्त के बीजापुर जिले क आइहोल के निकट स्थित है। दक्षिण में वाकाटकों के बाद एक शक्तिशाली वंश चालुक्य का उदय हुआ। इस वंश में पुलकेशियन प्रथा उसके पुत्र कीर्तिवर्मन, व उनके पुत्र पुलकेशियन द्वितीय प्रतापी राजा हुए है।

कीर्तिवर्मन के बाद उसका छोटा भाई मंगलेश चालुक्य वंश का शासक बना और उसने वात्यापिपुरम आधुनिक बादामी को अपनी राजधानी बनाया। शासक मंगलेश कला प्रेमी और कला का एक अच्छा संरक्षक था।

इसी कारण उसक काल में महाबलीपुरम ‘,’ काँचीपुरम और बदामी की चौथी गुफा जैसे कला स्थल बनकर तैयार हुएँ। बादामी की यह चौथी गुफा वास्तु शिल्पसज्जा और चित्रकारी की दृष्टि से श्रेष्ठ मानी जाती है।

बादामी (badami caves) की चौथी गुफा में मंगलेश के शासन काल के बारहवे वर्ष का एक लेख मिला है। जिसका समय 579 ई. है। इसके आधार पर बादामी गुफा (badami caves) का समय 579 ई. निश्चित किया जाता है।

इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस चौथी गुफा के मण्डप में विष्णु की प्रतिमा स्थापित की गई थी और इस प्रतिमा की पूजा-सेवा के लिए चालुक्य शासन की ओर से अनुदान रुप में लन्जीसवाडा नामक ग्राम की जागीर इस मन्दिर के प्रबन्ध हेतु दी गयी थी।

बादामी (badami caves) में कुल चार गुफा मन्दिर है, जिसमें एक जैनधर्म से और तीन ब्राह्मण धर्म से संबंधित है। इस प्रकार ब्राह्मण धर्म के चित्रों में अब तक के ज्ञात चित्र उदाहरणों में ये प्राचीनतम भित्ति चित्र है। इन चित्रों की शैली अजन्ता चित्र शैली से साम्यता रखती है।

बादामी चित्रों की खोज किसने की थी ?

बादामी चित्रों की खोज का श्रेय डॉ. स्टेला क्रेमरिश को मिलता है। कलाविद डॉ. शिवराममूर्ति ने भी बादामी गुफा के चित्र वैभव की भूरी-भूरी प्रशंसा की है।

 बादामी गुफा (badami caves) के चित्र

पहला दृश्य

इस विशाल पैनल चित्र के केन्द्र में राजा-रानी सिंहसनारुढ संगीत व नृत्य का आनन्द ले रहे हैं। कुछ दर्शक महल के ऊपरी झरोखे से इस दृश्य को देख रहे हैं। राजा की आकृति कोमल व नीलियायुक्त हरे रंग की है।

जिसका अब घड और हाथ ही शेष रहा है। केवल मुकुट बच गया और संपूर्ण मुखाकृति नाट हो चुकी है। शरीर पर चालुक्य काल की अनेक मालाएं और यज्ञोपवीत है। चित्र नीचे की और कुछ व्यक्ति बेटे है।

इधर-उधर कुछ स्त्रिया चंवर लेकर भी खड़ी हैं। बायी और इन्द्र की एक नृत्य सभा का चित्रण है। जिसमें इन्द्र को स्तम्ब युक्त मण्डप में सिंहासन पर बैठे दर्शाया है। पृष्ठभूमि में पर्दा भी टंगा है। चित्र के मध्य में एक युगल नृत्य कर रहा है।

जिसके आसपास स्त्रियों की एक मण्डली वाद्ययन्त्र बजा रही रही है चित्र में इन्द्र की विलासिता को व्यक्त किया गया है, और नृत्य दल उसे आसक्त करने का प्रयत्न व्यक्त करता है।

दूसरा दृश्य

इस पैनल में सिंहासन पर एक राजा विश्राम की मुद्रा में अधलेटा चित्रित है। राजा का एक पैर नीचे पादपीठ पर है और दूसरा पैर सिंहासन पर रखा है। निकट में अनेक राजकुमार व राजपुरुष बैठे हैं। दूसरी और रानी भी सिंहासन पर अलसायी मुद्रा में बैठी है, जिसका सिंहासन राजा के सिंहासन से कुछ नीचा है।

पास ही एक दासी राज चिन्ह दण्ड लिए खड़ी है। दूसरी ओर एक दासी रानी के पैर में अलक्तक लगा रही है। चारों ओर श्रृंगार प्रसाधिकाएँ बिखरी पड़ी है। रानी गौरवर्ण की है, तथा उसके कैश बड़े ही ढंग से संवारे हुए है।

सम्भवतः यह दृश्य मंगलेश के बड़े भाई कीर्तिवर्मन के परिवार का हो, कारण कि मंगलेश अपने बड़े भाई कीर्तिवर्मन का बड़ा ही सम्मान करता था। शिलाभिलेख में मंगलेश ने इस गुफा का समस्त वैभव अपने अग्रज को ही समर्पित किया है। गुफा के निकट ही एक वाराह प्रतिमा है।

गुफा के निकट ही वाराह की प्रतिमा स्थापित करना, सम्राट द्वारा अपने ईष्ट के समीप स्वयं को प्रतिस्थापित करने वाली बादामी की यह परम्परा आगे चलकर, ” महाबलीपुरम” में वाराह के निकट पल्लव राजा

नृसिंहवर्मन पिता महेन्द्रवर्मन और पितामह सिंहविष्णु की सपत्नीक आकृतियाँ उत्कीर्ण करने में यही परम्परा विकसित हुई। बादामी गुफा (badami caves) के अन्य पैनलों में कुछ खण्डित चित्र बचे हैं,

जिनमें “ आकाशगामी विद्याधर” चित्र की पृष्ठभमि में उड़ते हुए बादल, उड़ते हुए विद्याधर के युगल चित्र, आदि भावपूर्ण मुद्रा में अंकित हुए हैं। एक स्थान पर स्तम्भ का सहारा लिए एक ” विचारामग्न विरहणी” की आकृति भी अंकित है।

जिसकी आँखों और शारीरिक मुद्रा से गहरी वेदना व्यक्त होती है। यह चित्र दर्शक में भावोत्पन्न करने में विशेष महत्व रखता है।

बादामी गुफा (badami caves) का चित्रण विधान

बादामी चित्रों का चित्रण विधान बाघ से मिलता-जुलता है, किन्तु अभिव्यक्ति पूर्ण ये चित्र बहुत श्रेष्ठ है। आकृति निर्माण में कुछ अनुपातहीनता अवश्य है फिर भी भावाभिव्यक्ति में ये कोई कभी नहीं रखते हैं। वेशभूषा, मुद्राओं और संयोजन में बदामी गुफा के चित्रों पर अजन्ता का प्रभाव है।

 

बाघ की गुफाएँ

 

 

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