रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) की जीवनी

Rabindranath Tagore

Rabindranath Tagore रविंद्रनाथ ठाकुर

रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) का जीवन परिचय

बुढ़ापे में चित्रकला की और रुझान: “कला सर्जक, विश्व कवि रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) की सृजन शक्ति वास्तव में अजय, अपरिमेय तथा विलक्षण थी चित्रकला के क्षेत्र में मात्र रंग व रेखाएं ही कोई संदेश नहीं देती अपितु उनमें ध्वनि, लय होती है।

जिनका उद्देश्य कलाकार की कल्पना व संवेदना का समग्र विकास करना होता है” यह शब्द है विचार वेता साहित्यकार व चित्रकार रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) के रवींद्रनाथ ठाकुर की शाश्वत पिपासा आमिट रेखाओं के लिए कुछ करना चाहती थी।

रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) ने कहा था अब तक में अपने भावनाओं को साहित्य व संगीत में व्यक्त कर रहा हूं पर मेरी आत्माभिव्यक्ति के तरीके अपूर्ण रह

अतः भाव प्रकटीकरण के लिए चित्रित रेखाओं का सहारा ले रहा हूं” अपनी शाश्वत पिपासा की व्याख्या मैं उन्होंने कहा शरीर के प्यास के अलावा एक और भी प्यास मनुष्य को लगती हैं” इस महाकवि ने अपनी सतरंगी तूलिका के वैभव से अनेक चित्र बनाएं

रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) का जन्म

जोरा साकों (कोलकाता मैं) सन 1861 ईस्वी में हुआ था रविंदर नाथ ठाकुर ने बाल्यकाल में किसी चित्रण तकनीक का प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया बल्कि वे तो अपनी अनुभूतियों को रेखाओं में उभार कर अपने मन को बहलाते थे।

रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) का चित्रकार मन प्रारंभ में सुप्त रहा लेकिन जब जागा तो कहीं वर्षों तक वे उसी के वशीभूत होकर कार्य करते रहें असाधारण काव्य मय वृत्ति व सूक्ष्म ग्राहक संवेदना की कला के साधन थे

चित्रकला के अभ्यास को उन्होंने बड़ी तन्मयता वह निष्ठा से अभिराम रखा उन्होंने सैकड़ों चित्र वह रेखकंन बनाए उनकी अपनी व्यापक भाव च से पुष्ट होकर जो रंग व रेखाएं उभरी वे चित्र बन गई इन चित्रों का ना कोई रूप विधान था न नियम नही कोई लाक्षणिक आधार

इस समय रवीन्द्रनाथ ठाकुर के भतीजे अवनीन्द्रनाथ ठाकुर चित्रकला में पूर्ण दक्षता के साथ कार्य कर रहे थे। रवीन्द्रनाथ ने उन्हीं के सम्पर्क से चित्रकला की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा प्राप्त की व शब्द व साहित्य के क्षेत्र में अलग अपनी रचनात्मक शक्ति के आधार पर चित्रकला के क्षेत्र में सरलता से नैविष्ट हो गए।

आरम्भ में उन्होंने केवल स्याही के पेन से रेखांकन करके कला निर्मित की, जिसमें काल्पनिक पक्षी या ‘ जानवर’ जैसे आकार प्रचुर मात्रा में हैं। भारतीय आधुनिक कला के प्रणेता: आयु के 67 वें साल तक उन्होंने चित्रकला के क्षेत्र में कोई विशेष प्रयत्न नहीं किये।

वे विश्व-विख्यात कवि बन चुके थे। कविता लिखते समय शब्दों या पंक्तियों को रेखाओं से मिटाने पर जो अकल्पित आकार बनता, उनकी ओर उनका ध्यान आकृष्ट हुआ। इन स्वयं-सिद्ध आकारों के प्रति वे इतना मोहित हुए कि उन्होंने आकारों के विकास पर ध्यान दिया। भारतीय कला के इतिहास में यह अभूतपूर्व प्रयोग था।

सन् 1926 ई. के करीब उन्होंने कपड़े के टुकड़े या अंगुलियों को स्याही में डुबोकर चित्रण शुरू किया व बाद में सीमित रंगों का उपयोग किया। रवीन्द्रनाथ ने परम्परावादी व यथार्थवादी चित्रकला का पल्लू न पकड़ कर कला की आधुनिक शैली को अपनाया, जिसे उन्होंने समन्वयात्मक शैली कहा।

आरम्भ में रवीन्द्रनाथ ने अपने चित्रण को खेलक्रीड़ा मात्र समझा, किन्तु शीघ्र ही उन्हें अनुभव हुआ कि पाण्डुलिपि में किए गए रेखांकन से निर्मित आकारों में गूढ आत्माएँ निवास करती हैं, जो पापी लोकों के समान मुक्ति पाने के लिए आक्रोश कर रही हैं।

इस प्रकार उन्होंने आन्तरिक जीवन की प्रेरणा से कला निर्मित की। स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पांडुलिपियों में गलतियों को अपने लिए प्रेरणा माना है व लिखा है

कि ” कुछ रेखाओं से शांत करुणा की अभिव्यक्ति होती थी, तो कुछ से रोष। मैं तब ये नहीं जानता था कि वे आकृतियाँ, मेरी सौम्य कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में परिणित हो जाएंगी।” एक ओर जहाँ उनकी चित्रकला को हम पाश्चात्य भारतीय आधुनिक कला के निकट पाते हैं, वहीं दूसरी ओर ‘ चाइल्ड आर्ट’ के करीब भी पाते हैं।

विद्वान कला समीक्षक ‘ डॉ. आनन्द कुमारस्वामी’ ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के चित्रों को ‘ नोट चाईल्डिश बट चाइल्ड लाइक’ (Not Childish but child like) बताते हुए लिखा है कि ” शिशु के द्वारा निर्मित चित्रों में मन की कल्पना का जो अपर्याप्त प्राचुर्य और जो मन में आया, उसे चित्रण करने की सहज प्रवृत्ति मिलती है, उसे रवीन्द्रनाथ ठाकुर के चित्रों में खोज पाना कठिन है।

उनकी कला किसी पूर्वाग्रह से बंधी हुई नहीं थी, बल्कि उनके चित्र किसी भी आग्रह से मुक्ति का प्रयास थे। टैगोर की कला रेखाओं और लयात्मक माधुर्य की परम्परा से सम्बद्ध रही है, जो भाव-प्रवण एवं अभिव्यंजना कौशल से परिपूर्ण हैं।” रवीन्द्र निर्बन्ध व स्वतन्त्र चित्रकार थे।

उनके चित्र नाटकीयता व आकस्मिकता से पूर्ण हैं। उनके चित्रों में मनुष्य व प्रकृति का घनिष्ठ संबंध परिलक्षित होता है। उनके व्यंजनाप्रधान

चित्रों की अपनी विशेषता है उन की आकृति भंगिमा रूप व रेखा निराली है उनके सौंदर्य चेतना के पैमाने अलग है उनमें यह शिल्प दृष्टि साहित्य दृष्टि से उत्पन्न हुई थी भारतीय लघु चित्रों व अजंता के भित्ति चित्रों में जो लय है वही टैगोर के चित्रों में हैं

रविंद्र नाथ के चित्र परंपरावादी भारतीय यूरोपीय रूप विधान व प्रमुख कला की सामान्य व्यक्ति का सम्मिश्रण है

रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) प्रमुख प्रदर्शनियाँ:

सन् 1930 ई. में रवीन्द्रनाथ(Rabindranath Tagore) के चित्रों की प्रदर्शनी पेरिस की गैलेरी, ‘ पिगाल’ में हुई, जिसकी यूरोपीय प्रशंसकों व कला समीक्षकों ने प्रशंसा की। साथ ही यूरोप व अमरीका की कला दीर्घाओं ने उन्हें खरीदा तो सभी आश्चर्याभिभूत हो गये।

बाद में लंदन, बर्लिन, न्यूयार्क व मास्को में भी उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी। सन् 1932 ई. में उनके चित्रों की प्रदर्शनी कोलकाता में हुई। सन् 1946 ई. में ‘ यूनेस्को’ द्वारा आयोजित ‘ अन्तर्राष्ट्रीय आधुनिक कला प्रदर्शनी’ में उनके चार चित्र सम्मिलित किये गये।

सन् 1933 ई. में रवीन्द्र बाबू के चित्रों की प्रदर्शनी मुम्बई में लगाई गई तो भारतीय जनता दंग रह गई। इन चित्राकृतियों से वे चिढ़ जाते, ये हमारी समझ से परे हैं, इस प्रकार के उद्गार व्यक्त करते हुए व्यंग्य कसते, पर उस प्रकार की आलोचनाओं की रवीन्द्र को कोई चिन्ता न थी।

वे इन सबसे ऊपर थे। उनके चित्र स्वान्तः सुखाय थे, उनके अवचेतन की अभिसृष्टि उनकी अनियोजिका बुद्धि का कौशल। एक जगह उन्होंने लिखा है, ” लोग मुझ से मेरे चित्रों का अर्थ पूछते हैं, उद्देश्य पूछते हैं, उनके उत्तर में चित्रों की भाँति’ मौन ‘ से ही दे देता हूँ।”

उनके चित्र अनन्त विस्तृत मौन जगत का बिन्दुमात्र हैं। रवीन्द्रनाथ के अधिकतर चित्र ऐसे दिखते हैं कि वे तत्क्षणिक सृजन प्रेरणा द्वारा बिना पूर्वविचार के बनाये गये हैं। चित्रण को आरम्भ करते ही वे बिना विश्राम के तद्रूप होकर उसको शीघ्रता से पूर्ण करते।

नारी चित्रण: रवीन्द्रनाथ सौन्दर्य उपासक व शृंगार वृत्ति के कलाकार थे। उनके चित्रों का प्रमुख विषय ‘ नारी’ था। विशेष रूप से भारतीय नारी। ‘ उनके चित्रों में नारियों के सहज, सरल, भावपूर्ण चेहरे दिखते हैं। एक ओर वे काली घनी केश राशि के माध्य नारी, तो दूसरी ओर अंगविहीन दग्ध हृदय का अंकन भी करते।

जिनके विभिन्न रूपों में बसन्त और प्रेम की भावनाओं का गहन जगत देखा जा सकता है। रंग: रवीन्द्र बाबू ने सभी प्रकार के रंगों का प्रयोग किया, किन्तु वे द्रव्यमिश्रित रंगों को पसन्द करते और स्याही का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग करते।

रंग नहीं मिलने पर वे फूलों की पंखुड़ियों को दबाकर रंग को काम में लेते। वे रंगांकन पद्धति सामग्री से आंतरिक प्रेरणा को अधिक महत्त्व देते थे। प्रमुख चित्रों के शीर्षक उनके प्रमुख चित्रों में विचित्र जन्तु, आत्मनिरीक्षण, कूदता हुआ हिरण, दृश्य चित्र, पक्षी , मशीन मैन, चिड़िया, पक्षी युगल है। एक’ आत्म-चित्र ‘ की सृष्टि उन्होंने की है ।

उनके सभी चित्र शक्तिशाली प्रभावोत्पादक हे उनकी कला पूर्ण रूप से उनके प्रतिभा संपन्न आंतरिक जीवन की प्रतिमा है व उनके दर्शन में नैष्ठिक भारतीयत्व है उनकी कला निर्मिति के पीछे मौलिक कल्पना शक्ति व विशुद्ध सौंदर्य दृष्टि प्रेरणा भूत थी।

जब उनको उनके चित्र कला के बारे में पूछा गया तब उन्होंने कहा मेरे जीवन का प्रभात गीतो भरा था शाम रंग भरी हो जाए कुमार स्वामी ने के विषय में लिखा है कि उनकी मौलिक सहज सिद्ध अभिव्यक्ति असामान्य नित्य युक्त प्रतिमा का साक्ष्य है ।

घनिष्ठ कला प्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने शांतिनिकेतन मैं कलाभवन की प्रस्थापना की उनके कला संबंधी विचार “ क्ली” के विचारों से मिलते हैं रविंद्रनाथ (Rabindranath Tagore) की कला में भिन्न प्रकार की अनुभूतियों को साकार किया है ।

थके हुए यात्री मां और बच्चा सफेद धागे जैसे चित्रों में मानव जीवन का व्यापक दार्शनिक विचार हैं तो अंडा कृति मानव शीर्षों मैं जीवन की गहरी अनुभूतियां है प्राचीन कानाफूसी जैसे चित्र स्मृति व्याकुल है तो कहीं प्रकृति से घनिष्ठ संबंध की जीवंत झांकी प्रस्तुत करते हैं ।

रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) की देश विदेश में कला यात्रा:

रविंद्रनाथ (Rabindranath Tagore) को विश्व के अनेक आधुनिक शैलियों में कार्य करने वाले चित्रकारों से मिलने का सू अवसर प्राप्त हुआ उन्होंने यूरोप की यात्रा की तब फ्रांस के कलाकारों समीक्षको ने उनके चित्र देखें तो पेरिस मैं प्रदर्शनी का सुझाव दिया यह प्रदर्शनी बहुत सफल रही

रविंद्रनाथ (Rabindranath Tagore) जापानी व चीनी चित्रण पद्धतियों के अध्ययन के लिए जापान में 3 महीने तक रहे ।

रविंद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) को आधुनिक भारत का प्रथम रचनात्मक चित्रकार माना गया है रविंद्र नाथ (Rabindranath Tagore) एक समर्थ साहित्यकार संगीतकार व कुशल चित्रकार भी थे ।

रविंद्रनाथ (Rabindranath Tagore) ने भारत में चित्रकला के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात किया केवल भारत में ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व मैं उनकी नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्य कृति गीतांजलि की अनुगूंज आज भी सुनाई दे रही है उनका सर्जन साहित्य संगीत व कला हमारे लिए अमूल्य सौगात है रविंद्रनाथ (Rabindranath Tagore) जी कला जगत में हमेशा स्मरणीय रहेंगे

रविंद्रनाथ टैगोर की मृत्यु कब  हुई थी

7 August 1941
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