(रॉबी मालेट, पीएचडी अभ्यर्थी, सेंटर फॉर पोलर ऑब्जर्वेशन एंड मॉडलिंग, यूसीएल) लंदन, सात अगस्त (द कन्वरसेशन) हवा के बहाव के असामान्य पैटर्न ने वर्ष 2020 के सर्दियों के मौसम में आर्कटिक महासागर की पुरानी बर्फ को अस्थितरता वाली स्थिति में ला दिया है। पानी में गर्माहट की वजह से आर्कटिक में बर्फ के पुराने भंडार के पिघलने का खतरा पैदा हो गया है। लेकिन यह हुआ कैसे, और यह पुरानी बर्फ आखिर इतनी मायने क्यों रखती है?

आर्कटिक महासागर में जब सर्दी गहराती है तो उस वक्त तापमान शून्य से नीचे 30 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। सागर की ऊपरी सतह पर बहती बर्फ की परत और भी मोटी हो जाती है क्योंकि उसके नीचे बहता पानी भी जम जाता है। यह बर्फ उन स्थानों की ओर भी बहकर चली जाती है जहां पर कभी खुला पानी था। गर्मियों में जब तापमान बढ़ता है और सूर्य की किरणें तेज हो जाती हैं तो बर्फ की परत पतली हो जाती है और उस स्थान को छोड़ देती है। हर वर्ष सितंबर में, आर्कटिक सागर में बर्फ सालभर के सबसे न्यूनतम हिस्से में रह जाती है और इस पर वैज्ञानिकों की नजर रहती है क्योंकि यह संकेत देता है कि क्षेत्र में कितनी तेजी से बदलाव आ रहा है।

जो बर्फ गर्मी के मौसम में पिघलने से रह जाती है वह सर्दियों के एक और मौसम के लिए तैयार हो जाती है। कुछ बर्फ ऐसी होती हैं जो पिघलने से पहले गर्मियों के कई मौसम का सामना कर लेती है। यह आमतौर पर उत्तरी ध्रुव के निकट के ठंडे क्षेत्रों में होता है। जिस बर्फ का आस्तित्व गर्मियों में भी बना रहता है उसे स्थायी बर्फ (पेरेनियल आइस) कहते हैं और यह मोटी, सख्त तथा लोचदार होती है। यह आर्कटिक की जलवायु और पारिस्थितिकी का एक अहम हिस्सा है जो वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण लुप्त होता जा रहा है।

जब धरती पर सूरज की रोशनी आती है तो या तो यह परावर्तित होती है या अवशोषित होती है। जो रोशनी अवशोषित होती है वह ग्रह को गर्म बनाती है। समुद्री बर्फ सूरज की 90 फीसदी रोशनी को परावर्तित कर देती है जो बाहरी अंतरिक्ष में लौट जाती है और यह ग्लोबल वार्मिंग से शक्तिशाली तरीके से बचाव करती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण ध्रुवीय सागर की बर्फ पिघलने के चलते सूरज की रोशनी सागर तक पहुंचती है जहां यह 90 फीसदी तक अवशोषित हो जाती है।

स्थायी या कई सालों तक रहने वाली बर्फ खासतौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गर्मियों को सहने में अधिक सक्षम होने के साथ-साथ आर्कटिक महासागर को सूरज के ताप से बचाती है और क्षेत्र को ठंडा बनाए रखती है। लेकिन हर वर्ष बर्फ पिघलने का वक्त बढ़ता जा रहा है और बर्फ जमने की अवधि घटती जा रही है। आर्कटिक में दोनों ही मौसम गर्म हो रहे हैं।

आर्कटिक में स्थायी बर्फ का घेरा बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि बर्फ गर्म पानी से दूर रहे। हवा के चलते सागर की बर्फ आर्कटिक महासागर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक बहती है। यदि यह ठंडे क्षेत्र में जाती है तो इसके गर्मियों में कायम रहने और स्थायी बर्फ बनने की संभावना बढ़ जाती है लेकिन यदि यह दक्षिण की ओर गर्म पानी की तरफ जाती है तो पिघलने की आशंका रहती है।

फरवरी 2021 में देखा गया कि आर्कटिक के ऊपर वामावर्त हवा (घड़ी की विपरीत दिशा में बहने वाली हवा) ‘पोलर वोरटेक्स’ जो बेहद ठंडी हवा होती है वह एकदम से रूक गई जिससे क्षेत्र में सतह पर वायु के सर्वाधिक दबाव का नया रिकॉर्ड बना। इसके बाद ठंडा मौसम सतह पर दक्षिण की ओर बढ़ा जिससे ब्रिटेन में तापमान 1995 के बाद सर्वाधिक नीचे गिर गया। टेक्सास में बेहद ठंडे मौसम से पॉवर ग्रिड ठप पड़ गई जिससे 40 लाख लोग बिना बिजली के रहने को मजबूर हुए।

पोलर वोरटेक्स के अचानक से रूकने के कारण सतही हवाओं का एक असाधारण पैटर्न बना जो आर्कटिक की स्थायी बर्फ को ऐसे स्थान ‘‘ब्यूफोर्ट सी’ में ले गई जहां वह गर्मियों में कायम नहीं रह सकती। सर्दियों के बाद ब्यूफोर्ट सी में ऐसी स्थायी बर्फ भर जाती है जैसा फरवरी 2021 के अंतिम सप्ताह में हुआ। यहां चीजें वास्तव में रोचक हो गईं।

सैद्धांतिक रूप से कई सालों तक रहने वाली बर्फ गर्मियों में पिघलने के प्रतिकूल व्यवहार करती है। यह मोटी होती है और इसके ऊपर गहरा सुरक्षात्मक आवरण होता है। लेकिन ऐसा तब होता है जब स्थायी बर्फ खुद का आवरण बना ले।

फरवरी 2021 के अंतिम सप्ताह में स्थायी बर्फ का क्षेत्र 2013 के बाद दूसरा सबसे कम था। सितंबर में न्यूनतम क्षेत्र में बर्फ पिघलने के समय में एक महीना बाकी है, तो अभी कुछ और देखना होगा। लेकिन पूरी संभावना है कि 2021 स्थायी बर्फ के सबसे कम क्षेत्र का नया रिकॉर्ड बनाएगा।

द कन्वरसेशन

मानसी प्रशांत

प्रशांत

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