नीरज बधवार

मम्मी-पापा को आज वैक्सीन की दूसरी डोज़ लेनी थी। जिस सेंटर पर बुकिंग करवाई थी उसका नाम डालने पर गूगल में कोई जगह दिखाई नहीं दी। ये देखकर मैं घबरा गया कि लोगों को तो वैक्सीन नहीं मिल रही मुझे तो वेक्सीनेशन सेंटर ही दिखाई नहीं दे रहा। वो सेंटर जिस ब्लॉक में था मैं वहां पहुंच गया। वहां पहुंचने पर एक पुलिसवाले ने बताया कि ये जगह तो यहां से 25 किलोमीटर दूर है…आपको वहां जाना पड़ेगा! तभी सेंटर पर एक ताज़ा नहाया आदमी दिखाई दिया। देखकर लग रहा था कि वो शायद वहीं काम करता है। मेरी समस्या सुनी तो उसने बताया आपने रजिस्ट्रेशन करवा रखा है तो यहां भी वैक्सीन ले सकते हैं। सारा सिस्टम Centralized है।

वैक्सीन के लिए 1 से 3 बजे के स्लॉट की बुकिंग करवाई थी। मम्मी-पापा को गाड़ी में ही बिठा मैं लाइन में लग गया। आगे बमुश्किल 4-5 लोग थे। सामने खड़े शख्स से बात की, तो पता चला अभी लंच टाइम चल रहा है। 10 मिनट बीत, 20 मिनट गए, आधा घंटा गुज़रा लाइन वहीं की वहीं थी। मैंने वहां बैठे सिपाही से मज़ाक में पूछा कि भइया अंदर क्या भंडारा चल रहा है? ड्यूटी की थकावट में वो इतना दिमाग लगाने की स्थिति में नहीं था कि जोक समझा पाता!
मैंने फिर पूछा, भइया क्या हो गया…अगर लंच टाइम में वैक्सीन नहीं लगती, बाहर बोर्ड लगा दो या फिर टाइम स्लॉट ही डेढ़ से 3 का कर दो। इससे पहले वो कुछ बोलता एक सीनियर पुलिस अधिकारी अपने साथ दो लोगों को वहां पहुंचा। वो सीधे अंदर चले गए। वहां खड़े तमाम लोग समझ गए कि ये पुलिसवाले के कोई परिचित हैं। मगर इतनी धूप में किसी की क्रांति करने की हिम्मत नहीं थी। वो भी पुलिसवाले के खिलाफ इसलिए सब चुपचाप लाइन में खड़े रहे।

इसके भी दस मिनट बाद लाइन नहीं बढ़ी, तो सबकी हिम्मत जवाब दे गई। हल्ला हुआ तो पता चला कि जिस डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाना है वो अभी भी नहीं आई है! एक बजे के टाइम स्लॉट में आखिरकार 2 बजकर 5 मिनट पर लाइन में खड़ा आदमी आगे बढ़ा। मगर उसके अंदर जाते ही हंगामा हो गया। वो 45+ था और अपनी दूसरी डोज़ लेने आया था। अंदर जाकर उसे बताया गया कि अब यहां सिर्फ 60 से ऊपर वालों को ही वैक्सीन लग रही है। ये सुनते ही लाइन में खड़े 4-5 और लोगों को हार्ट अटैक आते-आते बचा। आधे से ज़्यादा लोग वहां 45+ थे। जब उन्होंने रजिस्ट्रेशन कराया, तो इस एज ग्रुप का वहां वैक्सीनेशन हो रहा था। और अब लाइन में एक घंटे लगने के बाद बताया गया कि वो सब गधे हैं जो बिना बात के ही वहां खड़े हैं। वैसे भी कोरोना इंसानों में फैल रहा है, गधों में नहीं इसलिए वो वापिस घर चले जाएं।

हंगामा बढ़ा, तो स्टाफ के लड़के ने बाहर आकर बताया कि यहां सिर्फ 60+ वालों का वैक्सीनेशन हो रहा है इसलिए बाकी लोग अपने-अपने गांव को लौट जाएं। जैसाकि तय था, इसके बाद वहां खूब हंगामा हुआ। जिसका आश्य लोगों को हिसाब से ये था कि सिस्टम निक्म्मा है और सिस्टम की नुमाइंदगी कर रहे उस लड़के का तेवर ये था कि, हां हम हैं निकम्मे, उखाड़ लो, जो उखाड़ना है। जैसाकि बुज़ुर्गों ने कहा हर चीज़ में कुछ फायदा छिपा होता है, तो इस अव्यवस्था का फायदा ये हुआ कि मेरे आगे खड़े सारे लोग 45+ होने के कारण disqualify हो गए और सीधे मम्मी-पापा की बारी आ गई। मैंने सिस्टम की इस अफरातफरी को दिल से धन्यवाद दिया और अंदर चला गया। लगा कि अब 5 मिनट में काम हो जाएगा।

मगर अंदर काउंटर पर बैठी कोरोना की छोटी बहन घर से ये तय करके आई थी कि वो आज किसी को टीका नहीं लगने देगी। मैंने मोबाइल पर रजिस्ट्रेशन का मैसेज दिखाया, तो बोली इनका वैक्सीनेशन तो नहीं हो सकता, ये तो दूसरे सेंटर का नाम है। मैंने कहा, मगर मेरी “फलानां जी” से बात हो गई है। मगर वो सुनने को तैयार नहीं थी। इस बीच वैक्सीनेशन से अयोग्य करार दिए गए 45+ लोगों की बौखलाई भीड़ अपने हक की सुई के लिए अंदर आ गई थी। वो सब वहीं आकर चिल्लाने लगे थे। लग रहा था कि उनकी चीखों से शीशीयों में भरी वैक्सीन ढक्कन तोड़कर पूरे वातावरण में फैल जाएगी। तभी कोरोना की छोटी बहन को इंसानियत का दौरा पड़ा। उसने मुझसे मेरा नंबर मांगकर रेकॉर्ड चेक किया तो उसमें मम्मी-पापा के रजिस्ट्रेशन की डिटेल्स मिल गईं।

पापा ने इंजेक्शन लगवाने के लिए टीशर्ट की बाजू ऊपर कर ली और इससे पहले कि ट्रेनी डॉक्टर इंजेक्शन लगाती, उसके बगल में रजिस्टर लेकर बैठे मोहम्मद कैफ ने पूछा, इनका आधार कार्ड नंबर क्या है? मैंने पापा को कहा, आपका आधार कार्ड कहां है? उन्होंने कहा, वो तो मैं लाया नहीं। मम्मी से पूछा, तो उन्होंने मुझे ही डांटते हुए कहा, तुमने कब बताया कि आधार कार्ड लाना है…हम वैक्सीनेशन वाला पिछला कार्ड लाए तो हैं! मैं इस बात पर दो सवाल और पूछता तो मुझे और डांट पड़ती और काम न करने की ताक में बैठे वहां के स्टाफ को समझ आ जाता कि कुछ गड़बड़ है।

इसलिए मैं चुपचाप वॉलेट में कार्ड ढूंढने की एक्टिंग करने लगा। तब तक पापा को इंजेक्शन लग गया। मगर कार्ड तो ढूंढना ही था क्योंकि स्टाफ के तेवर से लग रहा था कि इन्हें डिटेल्स नहीं बताई तो ये दोबारा टीका घुसाकर दवाई खींच लेंगे। इस बीच याद आया कि होटल बुकिंग के लिए एक बार सभी के आधार कार्ड की कॉपी मेल की थी मगर घबरारट में न होटल का नाम याद आ रहा था, न मेल का subject।

मेल ढूंढने की घबराहट में मेरे हाथ कांप रहे थे और तब तक 45+ की भीड़ अस्पताल को आग लगाने के लिए घर से मशाल ले आई थी। और इससे पहले की उनमें से कोई अस्पताल की दीवार पर पेट्रोल छिड़कता मुझे मेल मिल गया। मैंने एक सांस में दोनों के आधार कार्ड नंबर बताए। फौरन जाकर गाड़ी में बैठा और घर आ गया। रास्ते में मम्मी इस बात के लिए डांटते रहे कि तुमने बताया नहीं कि आधार कार्ड भी ले जाने थे!

दोस्तो, ज़रूरी नहीं कि हर जगह हालात ऐसे हों। कई जगह व्यवस्था बढ़िया भी है। मगर उस दो घंटे में मेरा जो अनुभव रहा ऐसा लगा कि मैं राग दरबारी के शिवपालगंज के सरकारी अस्पताल की सैर कर आया हूं। वो अस्पताल जो आज भी अपने पूरे हुस्न और पुरात्तविकता के साथ इस देश के हर शहर में ज़िंदा है। और जिनकी कमज़ोरी देखकर लगता है कि उन्हें ताकत देने के लिए इतने सालों में हमने कोई वैक्सीन नहीं दी

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