रामायण (ramayan) :

ramayan का इतिहास एवं कालक्रम

वाल्मीकि रामायण (ramayan) के रचनाकार:

महर्षि आदिकवि

1 वास्तविक नाम-रत्नाकर, अग्नि शर्मा

  1. प्रसिद्ध नाम-महर्षि वाल्मीकि

  2. उपाधियाँ-आदिकवि, महर्षि, ब्रह्मर्षि

  3. पिता-वरुण (आदित्य), प्रचेता (वाल्मीकि रामायण (ramayan) में दोनों का उल्लेख है)

5 दादा-महर्षि कश्यप

  1. भाई-भृगु ऋषि

  2. लेखन का प्रारम्भ-काममयी स्थिति में क्रौञ्च दम्पत्ति के निमग्न रहने पर एक शिकारी द्वारा नर क्रौञ्च मार देने पर क्रोध से भरे श्लोक के आविर्भाव होने के पश्चात् से

  3. रामायण (ramayan) लेखन के प्रेरक -1 नारदजी (प्रेरणा दी), 2. ब्रह्माजी

9 उल्लेखनीय तत्ये-वाल्मीकि रामायण के रचनाकार को नीच जाती का माना जाता है लेकिन उन्होंने स्वयं को प्रचेता की संतान बताया है मनु स्मृति के अनुसार प्रचेता वशिष्ट , नारद , पुलस्त , ऋषि के भाई थे अत : इस आशय से वाल्मीकि ब्राह्मण थे

एक बहुत बढ़ा वर्ग मानता है की वाल्मीकि रामायण की रचना करने से पूर्व शिकारी थे यह सर्वथा असगंत है

  1. उपासना- राम नाम उलटे रूप में (मरा-मरा) जपकर उपासना की

  2. (आश्रम)-, भेसा लोटन गाँव (वर्तमान चंपारण का वाल्मीकि नगर)

1 2.  वंशज गाँव स्थल- प्रचेता

  1. मुनि-भारद्वाज मुनि

  2. आश्रय प्रदाता – श्री राम की निर्वासित पत्नी सीता और उनके दो पुत्रो को आश्रय प्रधान किया

आदि महाकाव्य

1.रामायण का वास्तविक नाम

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (ramayan)

2 रामायण का प्रसिद्ध नाम-

रामायण (ramayan) (अन्य नाम-पौलस्त्य वध, दशानन वघ)

3. रामायण के रचनाकार

महर्षि वाल्मीकि

4. रामायण की प्रतिष्ठित

1 आदिकाव्य के रूप में 2. समस्त काव्यों के बीज के रूप में।

5. रामायण (ramayan) का उल्लेख

(1) स्कन्दपुराण में रामायण (ramayan) का माहात्म्य वर्णित किया गया है.

(2) ‘ रामायण (ramayan)तात्पर्यदीपिका’ जो व्यासजी की हस्त लिखित वाल्मीकि रामायण (ramayan) पर युधिष्ठिर के अनुरोध पर लिखी गई टीका है.

(3) द्रोण पर्व में वाल्मीकि के नाम का उल्लेख करते हुए वाल्मीकि रामायण (ramayan) के युद्धकाण्ड (लंका काण्ड) के 81/28 श्लोक का वर्णन किया गया है.

(4) गरुडपुराण पूर्वखण्ड के 143 वें अध्याय में रामायण (ramayan) सार वर्णित किया गया है.

(5) हरिवंश पुराण (विष्णु पर्व 93/ 6-33) में यदुवंशियों द्वारा वाल्मीकि रामायण (ramayan) के नाटक खेलने का उल्लेख किया है.

(6) महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में एवं भवभूति ने उत्तररामचरितम् में वाल्मीकि का उल्लेख किया है.

(7) गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस, कवितावली, विनय-पत्रिका, बरवै रामायण (ramayan) इत्यादि में वाल्मीकि रामायण (ramayan) एवं वाल्मीकि का उल्लेख किया है.

6. वाल्मीकि रामायण (ramayan) पर लिखी गई टीकाएं

(1) कतक टीका
(2) तिलक या रामभिरामी व्याख्या (नागाजी भट्ट की)
(3) भूषण टीका (गोविन्द राज की)
(4) रामायण (ramayan)-शिरोमणि व्याख्या (शिवसहाय की)
(5) तत्त्वदीप या तीर्थ व्याख्या (माहेश्वर तीर्थ की)

(6) रामानुजीय व्याख्या (कन्दाल रामानुज की)
(7) विवेक तिलक टीका (वरदराजकृत टीका)
(8) धर्माकूत व्याख्या (त्र्यम्बकराज मखानी की)
(9) रामायण (ramayan)कूट व्याख्या (रामानन्दतीर्थ की)

(10) वाल्मीकि हृदय व्याख्या (अहोबल की)
(11) रामायण (ramayan) तात्पर्य निर्णय व्याख्या (माधवाचार्य की)
(12) रामायण (ramayan)भूषण व्याख्या (प्रबाल मुकुन्द सूरि की)
(13) सुबोधिनी टीका (श्रीरामभद्राश्रम की)

(14) रामायण (ramayan) सार-संग्रह (वरदराजाचार्य की)
(15) विषय पदार्थ व्याख्या (देवराय भट्ट भद्र कृत)
(16) कल्पवल्लिका (नृसिंहशास्त्री कृत)
(17) रामायण (ramayan)ार्थ प्रकाशिका (वेंकटाचार्य कृत)

(18) अन्य टीकाओं में अमृतकतक, रामायण (ramayan) सार दीपिका गुरुवाला, चितरञ्जिनी, विद्वमनोरञ्जिनी, चतुरर्थ दीपिका, रामायण (ramayan)विरोध परिहार रामायण (ramayan)सेतु, तात्पर्य तरणि, शृंगार सुधाकर रामायण (ramayan)-सप्तबिम्ब, मनोरमा एवं उक्त कथित संस्कृत भाषा की प्राप्त वाल्मीकि रामायण (ramayan) की टीकाएं हैं, शेष हिन्दी, बंगला, मराठी, कन्नड़, गुजराती, मलयालम, फ्रेंच, अंग्रेजी इत्यादि भाषाओं की टीकाएं भी हैं.

7. वाल्मीकि रामायण (ramayan) की प्रमुख विशेषताएं

(1) विद्वानों का मानना है कि रामायण (ramayan) में निहित काव्यत्व के लक्षणों को आधारभूत मानकर ही दण्डि आदिकवियों ने काव्यों को परिभाषित किया था.

(2) वाल्मीकि रामायण (ramayan) का सुन्दरकाण्ड के (त्र्यम्बकराज मखानी कहना छन्दोबद्ध सार्थक के एवं अनुसार है अलंकारमय.) प्रत्येक है इसलिए शब्द उसे रसयुक्त सुन्दर,

(3) दशरथ किसी से वाल्मीकि प्रतिपादन प्रस्तुतीकरण जो अन्य चित्रण महाराज शैली रामायण (ramayan), काव्य किया हनुमानजी, रावण की, ग्रन्थ गया में सम्भाषण का में प्राकृतिक है की कथन, नहीं उस वार्तालाप पद्धति मिलता जैसा इत्यादि चित्रण, सुन्दर. श्रीराम कुशलता के, माध्यम चित्रण संवाद की,

(4) वाल्मीकि रामायण (ramayan) में ज्योतिषशास्त्र के तथ्यों का भी उत्कृष्ट तरीके से चित्रण किया गया है. त्रिजटा का स्वप्न, श्रीराम का यात्राकालिक मुहूर्त विचार, विभीषण द्वारा लंका के अपशकुनों का प्रतिपादन,

रावण-मरण की ग्रह स्थिति, लंकायुद्ध के मूल में नौ ग्रहों का इकट्ठा होना इत्यादि तथ्यों का खूबसूरत तरीके से ज्योतिष के समर्थन में चित्रण किया गया है.

(5) वाल्मीकि ने रामायण (ramayan) में ज्योतिष, तन्त्र, मन्त्र, आयुर्वेद, शकुन, राजनीति, दर्शन, अध्यात्म, धर्म इत्यादि पर विश्लेषणात्मक प्रस्तुति की है, जो अन्यत्र एक साथ मिलना दुर्लभ है.

(6) वाल्मीकि ने तप का चित्रण सुन्दर तरीके से किया है. उन्होंने तप को स्वर्गादि सभी सुखों का हेतु माना है. रामायण (ramayan) में विश्वामित्र, राम, रावण, भगीरथ, भृगु वैखानस, बालखिल्य, मरीचिय सम्प्रक्षाल, पत्राहारी, उन्मज्जक, पञ्चाग्निसेवी एवं अन्य तपस्वियों का वर्णन किया गया है.

8. वाल्मीकि रामायण (ramayan) में निहित भौगोलिक विवरण

(1) वाल्मीकि रावण द्वारा वर्णित रावण की लंका को विभिन्न शोधों के आधार पर वर्तमान में मालद्वीप सिद्ध किया गया है.

(2) रामायण (ramayan) में वर्णित धर्मारण्य वर्तमान में गया, गिरिव्रज वर्तमान बिहार में राजगीर, कानपुर के पास बिदूर नामक स्थल को वाल्मीकि का आश्रम स्थल माना जाता है.

  1. रामायण (ramayan) में वर्णित विषय-वस्तु के विभाग

(1) बालकाण्डम् (77 सर्ग) -वाल्मीकि रामायण (ramayan) का आरम्भ बालकाण्ड से होता है. 77 सर्गों में इसका वर्णन किया गया है. नारदजी ने वाल्मीकि को भगवान् किया श्रीराम का उपक्रम है.

इसके चरित्र, वाल्मीकि पश्चात् सुनाकर रामायण (ramayan) द्वारा इस रामायण (ramayan) काण्ड महाकाव्य को में प्रारम्भ लिखने वर्णित व राजमन्त्रियों वर्णन विषयों दरबार का अशुमान रावण भरत वर्णन, एवं में राजा वध का, और रामायण (ramayan) संक्षेप शत्रुघ्न देवताओं का और दशरथ भगीरथ उपाय में गान राजा की द्वारा जन्म के उल्लेख तलाश करना की की अनुरोध किए पर,,

नीति करना तपस्या आधारित लव अयोध्या गए पर कुश, एवं अश्वमेध राम ब्रह्माजी का का द्वारा कथावस्तु गुणों, लक्ष्मण वर्णन वर्णन राम द्वारा यज्ञ का,,,,

देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीरसागर का मंचन, धन्वन्तरि, अप्सरा, वारुणी, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ एवं अमृत की उत्पत्ति, शिवजी का विषपान करना, वशिष्ठजी की आज्ञा से कामधेनु गाय एवं विश्वामित्रजी के संहार के लिए शक, यवन, पल्लव आदि वीरों की सृष्टि करना.

श्रीरामादि चार भाइयों का विवाह, सीता एवं भगवान् राम के पारस्परिक प्रेम इत्यादि का वर्णन विस्तृत रूप में वाल्मीकि रामायण (ramayan) में किया गया है.

(2) अयोध्याकाण्डम् (119 सर्ग) -यह वाल्मीकि रामायण (ramayan) का दूसरा काण्ड है और 119 सर्गों में रामायण (ramayan) की प्रारम्भिक विषय-वस्तु का वर्णन किया गया है. अयोध्याकाण्ड में श्रीराम के सद्गुणों, राम का राज्याभिषेक करने पर विचार करना, दशरथ द्वारा श्रीसम को राजनीति की बातें बतलाना,

मंथरा का कैकेयी को बहकाना, कैकेयी द्वारा भरत का राज्याभिषेक एवं राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास वर रूप में दशरथ से माँगना, दशरथ का प्राण त्याग करना, श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का वनगमन करना, भरत का श्रीराम को मनाने के लिए वनगमन करना, श्रीराम द्वारा भरत को राजनीति का उपदेश देना,

जावालि के द्वारा नास्तिक मत का अवलम्बन करने के लिए श्रीराम को समझाना, अयोध्या की दुर वस्था, भरत द्वारा श्रीराम की चरण पादुकाओं पर राज्याभिषेक स्वीकार करना, सीता-अनुसूया संवाद एवं अन्य विषयों का विस्तृत रूप में वर्णन किया गया है.

(3) अरण्यकाण्डम् (75 सर्ग) -वाल्मीकि रामायण (ramayan) के तीसरे काण्ड अरण्यकाण्ड में 75 सर्गों में रामकथा का वर्णन किया गया है. इसमें श्रीराम द्वारा विराध का वध, वानप्रस्थ मुनियों द्वारा राक्षसों द्वारा किए जा रहे

अत्याचारों से रक्षा करने के लिए राम से प्रार्थना करना, सीता द्वारा श्रीराम से अहिंसा धर्म का पालन करने का अनुरोध, पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, अगस्त्य ऋषि के प्रभाव का वर्णन, जटायु से श्रीराम का परिचय, हेमन्त ऋतु का लक्ष्मण द्वारा वर्णन, सूर्पणखा का लक्ष्मण से प्रणय निवेदन करना,

खरदूषण का राम के साथ युद्ध, श्रीराम द्वारा दूषण एवं खर सहित चौदह सहस राक्षसों का वध करना, रावण के द्वारा सीता का अपहरण करना, रावण द्वारा सीता को अपनी पत्नी बनने के लिए बाध्य करना, सीता को रावण द्वारा अपने अन्तःपुर में रखना, श्रीराम का सीता के विरह में विलाप करना, जटायु का प्राण त्याग करना और श्रीराम के

द्वारा उसका दाह संस्कार करना, कबन्ध की कथा, श्रीराम, लक्ष्मण द्वारा सीता को खोजना, शबरी के आश्रम में राम और लक्ष्मण का जाना, सुग्रीव से मित्रता के लिए पम्पापुर की ओर गमन करना एवं अन्य विषयों का विश्लेषणात्मक वर्णन अरण्यकाण्ड में किया गया है.

(4) किष्किन्धाकाण्डम् (67 सर्ग) वाल्मीकि रामायण (ramayan) का किष्किन्धा-काण्ड 67 सों में वर्णित किया गया है. इस काण्ड के अन्तर्गत पम्या सरोवर की सुन्दरता का वर्णन, श्रीराम का हनुमानादि वानरों से परिचय, सुग्रीव और श्रीराम की मैत्री, सुग्रीव द्वारा सीताजी के आभूषण दिखलाने पर शोकग्रस्त होना.

बाली का राम के द्वारा वध करना, सुग्रीव और अंगद का हनुमानजी द्वारा अभिषेक करना. श्रीराम द्वारा वर्षा ऋतु का वर्णन किया जाना, शरद् ऋतु का वर्णन, लक्ष्मण और सुग्रीव के बीच मतभेद, वानरों का विभिन्न दिशाओं में भ्रमण कर सीता को खोजना, सुग्रीव द्वारा भूमण्डल वृत्तान्त श्रीराम को बतलाना,

सम्पाति द्वारा रावण और सीता का पता बतलाना, सम्पाति की आत्मकथा, हनुमानजी का समुद्र लंघन करने के लिए महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना इत्यादि विषयों का विस्तृत वर्णन किया गया है.

(5) सुन्दरकाण्डम् (68 सर्ग) -सुन्दरकाण्ड की विषय-वस्तु 68 सगों में वर्णित की गई है. इस काण्ड में हनुमानजी द्वारा समुद्र को लंघन करना, लंका में हनुमानजी का पहुंचना, लंकापुरी, रावण के अन्तःपुर, पुष्पक विमान एवं चन्द्रोदय का वर्णन, सीता को अशोक वाटिका में खोजना,

सीताजी की दुरावस्था का वर्णन, सीता का विलाप, हनुमानजी द्वारा सीता से वार्तालाप करना एवं आश्वासन देना, हनुमानजी का सीताजी को चूडामणि प्रदान करना, हनुमानजी द्वारा लंकापुरी का दहन, हनुमानजी का लंका से लौटना, जामवन्त, अंगद आदि को

हनुमानजी द्वारा लंका यात्रा का समस्त विवरण सुनाना, श्रीराम को हनुमानजी द्वारा सीता के समाचार सुनाना एवं अन्य विषयों पर विस्तृत सामग्री को वर्णित किया गया है.

(6) युद्धकाण्डम् (128 सर्ग) नामानुरूप इसके 128 सों में राम एवं राक्षसों के मध्य हुए युद्धों का विस्तृत स्वरूप में वर्णित किया गया है. युद्धकाण्ड में श्रीराम के साथ वानर सेना का लंका की तरफ प्रस्थान करना, श्रीराम का सीता के लिए विलाप करना, विभीषण, मन्दोदरी एवं अन्य राक्षसों के द्वारा रावण को समझाना

सीताजी को लौटने की सलाह देना, विभीषण द्वारा श्रीराम की शरण में जाना, समुद्र में नल-नील द्वारा सौ योजन पुल का निर्माण करना, उस पुल को पारकर वानर सेना एवं श्रीराम का दूसरी तरफ पहुँचना, सुग्रीव और रावण का मल्लयुद्ध, वानरों द्वारा लंका पर चढ़ाई करना,

श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश में इन्द्रजीत द्वारा बाँधना, गरुड़ द्वारा श्रीराम लक्ष्मण को नागपाश बंधन से मुक्त करना, कुम्भकर्ण को जगाया जाना, उसे देखकर वानरों का भयभीत होना, कुम्भकर्ण द्वारा रावण को समझाना, वानरों एवं श्रीराम से युद्ध करते हुए कुम्भकर्णादि कई राक्षसों का मारा जाना, लक्ष्मण का मूर्छित होना, हनुमानजी द्वारा पर्वत उठाकर लाना,

लक्ष्मण का स्वस्थ होना, लक्ष्मण द्वारा इन्द्रजीत का वध करना, श्रीराम को विजय प्राप्ति के लिए अगस्त्य मुनि द्वारा ‘ आदित्य हृदय ‘ के पाठ करने की सलाह देना, श्रीराम द्वारा रावण का वध करना, रावण का दाह संस्कार करना, विभीषण का राज्याभिषेक करना, सीता से राम की मुलाकात होना,

सीता का परित्याग करना, सीता की अग्नि परीक्षा, सीता की पवित्रता की पुष्टि होने पर राम द्वारा स्वीकार करना, भरत से रामादि की मुलाकात, श्रीराम का अयोध्या में गमन कर राज्याभिषेक सँभालना एवं रामायण (ramayan) का महात्म्य काव्यशैली में वाल्मीकि ने वर्णित किया है.

(7) उत्तरकाण्डम् (111 सर्ग) -वाल्मीकीय रामायण (ramayan) की अन्तिम उपसंहारात्मक विषय वस्तु उत्तरकाण्ड के 111 सर्गों में वर्णित की गई है. उत्तरकाण्ड में श्रीराम के दरबार में महर्षियों का आगमन, विश्रवा मुनि की उत्पत्ति, पुलस्त्य की तपस्या, कुबेर की उत्पत्ति,

राक्षस वंश का वर्णन, भगवान् विष्णु द्वारा राक्षसों का संहार, रावण का जन्म होना एवं गोकर्ण आश्रम में तप के लिए जाना, लंका में रावण का राज्याभिषेक, सूर्पणखा तथा रावणादि तीनों भाइयों का विवाह, मेघनाद का जन्म, नन्दीश्वर द्वारा रावण को श्राप देना,

हनुमानादि वानरों की उत्पत्ति, सीता को त्यागे जाने पर वाल्मीकि के आश्रम में शरण लेना, कल्माषपाद की कथा, विभिन्न ऋषियों एवं महर्षियों के शाप एवं पूर्वजन्मों की कथा, सीता के दो पुत्रों का जन्म, श्रीराम द्वारा अश्वमेध यज्ञ करना, यज्ञ में आमन्त्रित का गान करना,

सीता का शपथ ग्रहण कर रसातल में प्रवेश करना, भरत द्वारा गन्धर्वो पर आक्रमण किया जाना, लक्ष्मण का सशरीर स्वर्गगमन करना, श्रीराम का परमलोक में गमन करना एवं रामायण (ramayan) काव्य का उपसंहार एवं महिमा बेहद उत्कृष्टतम् तरीके से वर्णित की गई है.

10. रामायण के उल्लेखनीय तथ्य

(1) वाल्मीकि रामायण को आदिकाव्य एवं वाल्मीकि को आदिकवि की उपाधि सर्वप्रथम रचने वाले कवि एवं सर्वप्रथम काव्यात्मक स्वरूप में रची गई रचना के
कारण सम्पूर्ण काव्य जगत् में प्राप्त है.

(2) वाल्मीकि रामायण 7 काण्डों, 645 सर्गों एवं 24,000 श्लोकों में काव्यात्मक रूप में वर्णित की गई है.

(3) वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के चतुर्थ सर्ग में रामायण में 500 सर्गों के होने का उल्लेख किया है, लेकिन वर्तमान में गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित
रामायण में 645 सर्ग हैं, सम्भवतः इन्हें बाद में जोड़ा गया है.

(4) वाल्मीकि रामायण का सर्वप्रथम गान राम द्वाराकराए गए अश्वमेध यज्ञ में लव और कुश द्वारा किया गया था.

(5) वाल्मीकि रामायण गेय हैं और इसमें द्रुत, मध्यम्, विलम्बित तीनों गतियों, षड्ज इत्यादि सात स्वरों,शृंगार, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक तथा वीर रस
का विश्व में सबसे पहले प्रयोग किया है. इसी आधार पर यह कहा जाता है कि दण्डी आदि कवियों ने वाल्मीकि रामायण के लक्षणों के आधार पर ही साहित्य के समस्त अंगों का निर्धारण एवं वर्णन किया है.

(6) वाल्मीकि रामायण स्वर और ताल के साथ, वीणा आदि वाद्य यन्त्रों के साथ गाया जा सकने वाला प्रथम महाकाव्य है.

(7) वाल्मीकिजी को अनुष्टुप छन्द का सृष्टा कहा जाता वाल्मीकिजी है. वाल्मीकीय अपने रामायण शिष्य भारद्वाज के अनुसार के साथ एक तमसा बार नदी के तट पर स्नान करने के लिए गए थे, वहाँ पर एक क्रौंच पक्षी का जोड़ा देखा, जो कभी भी अलग नहीं होता था. उस समय वे प्रेम में रत थे.

एक शिकारी ने उनमें से नर क्रौंच को मार डाला. उसकी हुए छन्दोबद्ध विलाप हत्या किया श्लोक से मादा. वाल्मीकि में उस क्रौंची शिकारी ने ने दुःखानुभूति गहरा को शोक श्राप होने दर्शाते दिया पर जाता और वहीं है. से अनुष्टुप छन्द का आविर्भाव माना

(8) अनुष्टुप छन्द की उत्पत्ति होने के पश्चात् ब्रह्माजी के वरदान देने पर वाल्मीकीय रामायण की वाल्मीकि द्वारा वाल्मीकि रचना रामायण की गई कुछ-ऐसा पद्यों विद्वानों को छोड़कर का मत अनुष्टुप है. छन्द में लिखी गई है.

(9) वाल्मीकीय रामायण में तत्पुरुष आदि समासों, प्रकृति, प्रत्यय, दीर्घ गुणादि सन्धियों का यथायोग्य प्रयोग हुआ है. इनका प्रयोग करने वाला यह सबसे
पहला महाकाव्य माना जाता है.

(10) वाल्मीकीय रामायण में समता, पदों में माधुर्य तथा अर्थ में प्रसाद गुण की अधिकता को हर कहीं देखा जा सकता है.

(11) वाल्मीकीय रामायण के अनुसार अयोध्या नगरी को
आदिपुरुष मनु ने बनवाया था.

(12) रामायण के अनुसार अयोध्या की लम्बाई बारह योजन एवं चौड़ाई तीन योजन थी. इसके चारों ओर जा खाई खुदी हुई थी और इस नगरी को अष्टापदाकारा (धूतफलक) में बसाया गया था. अयोध्या के महलों पर सोने के पानी चढ़े होने का भी उल्लेख मिलता है.

(13) रामायण में विभिन्न प्रकार की नीतियों एवं मर्यादापूर्ण विषय-वस्तु का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है, इसी आधार पर इसकी प्रतिष्ठा नीतिगत महाकाव्य के रूप में है.

(14) रामायण में मूलतः 6,000 पद्य थे, जिन्हें विस्तृत कर। 24,000 कालान्तर में बनाए गए.

11. रामायण के ऐतिहासिक तथ्य

(1) वाल्मीकीय रामायण में उल्लिखित तथ्यों के अनुसार तत्कालीन समाज में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थों की प्रधानता, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और
शूद्रों का जन्मानुसार अपने-अपने कर्मों में रत रहने, चार आश्रमों में जीवन व्यतीत करने का उल्लेख किया गया है.

(2) अयोध्या अर्थात् जहाँ पर पहुँच पर कोई युद्ध न कर सके इस आधार पर अयोध्या का नामकरण हुआ माना जाता है.

(3) वशिष्ठ मार्कण्डेय धर्मपाल धृष्टि, जयन्त, और, सुमन्त्र कात्यायन वामदेव, विजय, काश्यप दशरथ, इत्यादि सुराष्ट्र, जाबालि के, महाराज पुरोहित राष्ट्रवर्धन सुयज्ञ दशरथ (,, जत्विज अकोप गौतम के),,, विद्वान् मंत्री थे.

(4) मंत्रियों का कार्य चतुरंगिणी सेना का संग्रह, गुप्तचरों द्वारा अन्य राजाओं के कार्य की जानकारी लेना, कोष का संचय करना, अपराधी को बलाबल के आधार पर दण्ड देना इत्यादि होते थे.

(5) पुत्रादि प्राप्ति के लिए पुरोहितों द्वारा विधिजन्य तरीकों से अश्वमेधादि यज्ञों का प्रचलन जोरों पर था. विधिहीन यज्ञ को यजमान को नष्ट करने वाला माना
गया था.

(6) ब्रह्मचर्य पालन के दो रूप माने जाते थे-पहला दण्ड मेखलादि धारण कर मुख्य रूप से ब्रह्मचर्य पालन करना और दूसरा ऋतुकाल में पत्नी समागम करते हुए गौण ब्रह्मचर्य का पालन करना.

(7) स्त्रियों द्वारा विभिन्न प्रकार के आभूषण धारण करने, पतिव्रत को सर्वस्व मानने.

(8) वेश्यावृत्ति, जुआ आदि का उल्लेख तत्कालीन समाज में व्याप्त होने के सन्दर्भ में मिलता है. राजाओं द्वारा अपनी कार्यसिद्धि के लिए वेश्याओं के माध्यम से तपस्वियों के तप भंग करने का उल्लेख भी मिलता है.

(9) वाल्मीकीय रामायण में सेवकों, शिल्पकारों, बढ़इयों, भूमि खोदने वालों, कारीगरों, नटों, ज्योतिषियों, नर्तकों, रजकों इत्यादि विभिन्न व्यवसायी वर्गों का
उल्लेख मिलता है.

(10) सम्मानपूर्वक दान देने की परम्परा विद्यमान थी. दान में अन्न, आभूषण, वस्त्र, धन, सम्पदा एवं रत्न, अश्वादि दिए जाने का उल्लेख मिलता है.

(11) ब्राह्मण षडांगों के ज्ञाता, ब्रह्मचर्य व्रतधारी, बहुश्रुत, विधि, मीमांसा और कल्पसूत्र के जानकार होते थे.

(12) बेल, खैर, पलाश एवं बिल्वादि वृक्षों को धार्मिक एवं पूज्यनीय वृक्ष माना जाता था.

(13) अश्वमेध यज्ञ तीन चरणों में सम्पन्न होता था. प्रथम दिन को चतुष्टोम (अग्निस्टोम), द्वितीय दिन उक्थ्य था तीसरे दिन ‘ अतिरात्र ‘ कहा जाता था.

(14) अश्वमेध यज्ञ में चारों दिशाओं का राज्य दक्षिणा में दिए जाने का उल्लेख रामायण में मिलता है.

(15) ब्राह्मण आचार्यों द्वारा राज्य अस्वीकार करने पर महाराज दशरथ ने अश्वमेध यज्ञ की दक्षिणा के रूप में दस लाख गौएँ, दस करोड़ स्वर्णमुद्रा एवं चालीस करोड़ रजत मुद्राएं प्रत्येक को दान में दी थीं.

(16) जलमार्ग द्वारा रत्नादि व्यवसाय करने का उल्लेख रामायण के अयोध्याकाण्ड के 82 वें सर्ग में किया गया है.

(17) तत्कालीन शासक के पास वैतनिक एवं अवैतनिक दोनों प्रकार के कार्यकर्ताओं एवं सेवकों के होने का उल्लेख मिलता है.

(18) सेना में घोड़े, बैलगाड़ियाँ, रथ आदि प्रयोग में लाए जाने का उल्लेख मिलता है,

(19) हाथी, घुड़सवार एवं धनुर्धर सेना में प्रमुख रूप से आवश्यक होते थे.

(20) मणिकार, कुम्भकार, सूत से वस्त्र बनाने वाले, शस्त्र निर्माण करने वाले, मायूरक (मोर पंखों से छत्र बनाने वाले), चन्दन की लकड़ी आरे से चीरने वाले, मणियों में छेद करने वाले, रोचक (दीवारों एवं वेदियों को सजाने वाले),

दन्तकार (हाथीदाँत, सुधाकार (चूना बनाने वाले), गन्धी, सोनार, कम्बल और कालीन बनाने वाले, गर्म जल से नहलाने का काम करने वाले, वैद्य, धूपक (धूपन क्रिया द्वारा जीविका चलाने वाले), शौण्डिक (मद्य विक्रेता), धोबी, दर्जी, गाँवों एवं
गोशालाओं के महती, नट, केवट इत्यादि

व्यावसायिक वर्गों के होने का उल्लेख भी वाल्मीकीय रामायण में मिलता है.

(21) तत्कालीन समाज में तन्त्र, मन्त्र, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, शकुन-अपशकुंन का अत्यधिक प्रचलन था.

(22) रामायण को ऐतिहासिक से अधिक सांस्कृतिक महत्व का काव्य माना जाता है, क्योंकि इसमें इतिहास तलाशने के तथ्य अधिक नहीं हैं.

12.रामायण का कालक्रम

(1) प्रो. रामशरण के अनुसार, रामायण की रचना बारहवीं शताब्दी ई. पू. में प्रारम्भ हुई और पाँचवीं शताब्दी ई. पू. तक पाँच चरणों में पूर्ण हुई.

(2) प्रो. रामशरण के अनुसार, रामायण की रचना महाभारत के बाद हुई, लेकिन प्रो. रामशरण का कथन तर्कसंगत नहीं लगता, क्योंकि महाभारत में कई स्थानों पर वाल्मीकीय रामायण का उल्लेख एवं वर्णन किया गया मिलता है.

(3) स्वीकार रूप में रामायण का प्रारम्भिक रचनाकाल 500 ई. पू. एवं अन्तिम रूप से संकलन 400 ई. पू. माना जाता है.

Spread the love