प्राचीन भारत के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

अहिच्छत्र प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

वर्तमान में अहिच्छत्र उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में अवस्थित रामनगर को माना गया है. महाजनपद-कालीन भारत में अहिच्छत्र उत्तरी पांचाल की राजधानी थी. इसका विशद् वर्णन महाभारत में मिलता है. कालान्तर में अहिच्छत्र को द्रोणाचार्य द्वारा लिया गया था. इस स्थल से चित्रित धूसर मृदुभाण्ड संस्कृति एवं लाल मृदुभाण्ड संस्कृति के अवशेष प्राप्त हैं. मौर्यकालीन भारत में यह मूर्तिकला का प्रसिद्ध केन्द्र है.

उज्जयिनी प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्थल उज्जयिनी वर्तमान में उज्जैन के नाम से जाना जाता है. यह मालवा प्रान्त की एक महत्वपूर्ण नगरी के रूप में प्रसिद्ध रही है. महाजनपदकालीन भारत में उज्जयिनी उत्तरी अवन्ति राज्य की राजधानी थी.

छठी शताब्दी ई. पू. में उज्जयिनी का अत्यधिक महत्व था, क्योंकि उत्तर से दक्षिण को जाने वाला व्यापारिक मार्ग उज्जैन के पास से ही गुजरता था. यह नगर शिप्रा नदी के तट पर अवस्थित है.

पाँचवीं शताब्दी में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनायी थी. यहाँ पर महाकालेश्वर मन्दिर, मंगलनाथ का मन्दिर कृष्णमंदिर, गोपालजी का मंदिर एवं अन्य दर्शनीय स्थल विद्यमान है.

इन्द्रप्रस्थ प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

महाजनपदकालीन भारत में कुछ महाजनपदों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी, जो दिल्ली के पास स्थित थी. प्रारम्भ में यहाँ पर राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली थी, जो कालान्तर में गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली हो गई थी. इन्द्रप्रस्थ के सम्बन्ध में महाभारत में वर्णन मिलता है. पाण्डवों ने इंद्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाई थी

वाराणसी प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल वाराणसी महाजनपद काशी की राजधानी थी. गुप्तिल जातक के अनुसार उस दौरान वाराणसी बारह योजन क्षेत्र में फैली हुई थी. यह वरुणा और अस्सी नदियों के संगम तट पर अवस्थित थी एवं इसका नामकरण वहाँ के राजा बानर के नाम पर किया गया था. सातवीं शताब्दी पूर्व यहाँ पर जनजीवन स्थापित होने के साक्ष्य प्राप्त हुए

वाराणसी को हिन्दुओं की सात पवित्र नगरियों ने एक माना जाता है. यह बौद्ध एवं जैन धर्म का भी केन्द्र रही है. यहाँ का विश्वनाय (शिव) मंदिर प्रसिद्ध तीर्थ माना जाता है. तीसरी शताब्दी ई.पू. में वाराणसी सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध एवं शिक्षा संस्थान के रूप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की ख्याति हर जगह फैली हुई है.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 21 वाँ अधिवेशन गोपालकृष्ण गोखले की अध्यक्षता में वाराणसी में ही सम्पन्न हुआ था. इस तरह धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं अन्य गति विधियों में वाराणसी प्रारम्भकाल से सक्रिय रहा है.

मथुरा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

श्री कृष्ण की लीला-स्थली के रूप में ज्यात मथुरा शूरसेन महाजनपद की राजधानी थी. मथुरा प्राचीनकाल में धार्मिक एवं व्यापारिक केन्द्र के रूप में जानी जाती रही है. यह यमुना नदी के तट पर अवस्थित एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र या. पुराणों एवं महाभारत में इस राज्य का वर्णन मिलता है.

यहाँ पर यदुवंशीय शासकों का राज्य या. गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली से राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली मथुरा में बाद में हुई यी. चीनी यात्री फाह्यान ने मथुरा में भ्रमण कर बौद्ध बिहारों का निरीक्षण किया था. अठारहवीं शताब्दी में जाट सरदार सूरजभान ने इसे अपनी राजधानी बनाया था.

कोशल प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

पूर्वी उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में महाजनपद कोशल अवस्थित था. पूर्वी क्षेत्र गण्डक नदी तक, पश्चिम क्षेत्र पांचाल, दक्षिण क्षेत्र सर्पिरा तथा उत्तर क्षेत्र नेपाल की तराई तक फैला हुआ था. सरयू कोशल को उत्तरी कोशल एवं दक्षिणी कोशल में विभाजित करती थी.

उत्तरी कोशल की राजधानी श्रावस्ती एवं अयोध्या तथा दक्षिणी कोशल की राजधानी कुशावती थी. कालान्तर में अजातशत्रु ने कौशल को मगध साम्राज्य में मिला लिया था. कोशल के राज्य स्वयं को इक्ष्वाकुवंशीय मानते थे. कोशल का पहला ऐतिहासिक शासक प्रसेनजित था, जो बिम्बिसार का समकालीन था.

ताम्रलिप्ति प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन भारतीय स्थल ताम्रलिप्ति वर्तमान में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले का तामलुक नगर है. पाँचवी शताब्दी में यह प्रसिद्ध बन्दरगाह या. चीनी यात्री फाह्यान बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए ताम्रलिप्ति आया था. फाह्यान ने अपने यात्रा विवरण में ताम्रलिप्ति के 24 संघाराम विहारों का उल्लेख किया था.

इस स्थल पर उत्खनन के दौरान उत्तरी ओपदार मृद्भाण्ड संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं. पहले यह स्थाल समुद्र के निकट था, लेकिन गंगा के मार्ग परिवर्तित होने के साथ ही इसका महत्व कम होता गया,

चम्पा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन भारत का सबसे प्रमुख महाजनपद अंग था, जिसकी राजधानी चम्पा थी. चम्पा छठी शताब्दी ई.पू. में प्रमुख व्यापारिक नगरी के रूप में जानी जाती थी. यह गंगा और मालिनी नदियों के संगमपर अवस्थित थी. यहाँ पर उत्खनन के दौरान छठी शताब्दी ई. पू. में जनजीवन के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं.

चम्पा की पहचान वर्तमान बिहार के भागलपुर क्षेत्र से की गई है, जैन धर्मन के तीर्थकर वसुपूज्य की जन्म स्थल चम्पानगरी ही थी. चम्पा शिल्प नगरी के रूप में ख्याति प्राप्त थी.

काम्पिल्य प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अवस्थित पांचाल महाजनपद के दो भाग थे-उत्तरी पांचाल एवं दक्षिणी पांचाल, उनमें से दक्षिणी पांचाल की राजधानी काम्पिल्य थी. काम्पिल्य की पहचान वर्तमान फर्रुखाबाद (उ. प्र.) से की गई है. द्रौपदी पांचाल की कन्या थी, इसी के फलस्वरूप उसे पांचाली कहा जाता था. महाभारत, बौद्ध जातक एवं जैन धर्म ग्रन्थों में काम्पिल्य का वर्णन किया गया है.

कौशाम्बी प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन भारत में कोसम या कौशाम्बी वत्स महाजनपद की राजधानी थी. यह इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) के समीप अवस्थित थी. महाभारत के अनुसार कौशाम्बी को चेदियों ने बसाया था. ‘ निचक्षु’ नामक शासक ने बाढ़ आ जाने के कारण कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाई थी. यहाँ का विश्वविद्यालय भी प्रमुख शिक्षा केन्द्र माना जाता रहा है. कौशाम्बी का महत्व धार्मिक एवं आर्थिक कारकों से अक्षुण्ण बना रहा है.

कपिलवस्तु प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्थलों में कपिलवस्तु का नाम उल्लेखनीय है. कपिलवस्तु उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के उत्तर में नेपाल की तराई में अवस्थित है, वर्तमान में इसे बुद्ध के नाम पर सिद्धार्थ नगर कहा जाता है. बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म 566 ई. पू. (कुछ विद्वानों के अनुसार 563 ई.पू.) कपिलवस्तु के समीप लुम्बिनी में हुआ था.

कपिल वस्तु शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘ कपिल का स्थान है और इसी के फलस्वरूप विभिन्न विद्वानों ने सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कपिल मुनि का सम्बन्ध कपिलवस्तु से बतलाया है. आधुनिक अनुसंधानों एवं उत्खनन से ज्ञात हुआ है कि पिपरहवा नामक स्थल ही कपिलवस्तु था.

बुद्धकाल में कपिलवस्तु शाक्य गणराज्य की राजधानी थी. इसके अतिरिक्त मौर्यकालीन शासक अशोक की यात्रा का वर्णन भी यहाँ के सन्दर्भ में मिलता है. दस गणराज्यों में सम्मिलित कपिलवस्तु पर बुद्ध के जन्म के समय इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रियों का शासन था .

गौतम बुद्ध के पिता शुद्धोदन शाक्यों के के मध्य रोहिणी नदी थी, जो विभाजक का कार्य करती थी. रोहिणी नदी के जल के बँटवारे पर शाक्यों एवं कोलिषों में परस्पर कपिलवस्तु संघर्ष जाकर होता इस रहता विवाद था को. शान्त एक कराया बार बुद्ध था. ने स्वयं ऋषिपत्तन उत्तर प्रदेश में वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ को प्राचीनकाल प्राचीनकाल से में ही ‘

ऋषिपत्तन विश्वविख्यात’ कला केन्द्र जाता रहा था. है यह. महात्मा बौद्ध धर्म बुद्ध का ने ‘ सम्बोधि ‘ (सच्चे ज्ञान की प्राप्ति) के पश्चात् सर्वप्रथम ऋषिपत्तन (सारनाथ) में ही प्रथम उपदेश अपने पाँच साथियों को दिया था, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन (Turning of the Wheel) कहा गया था.

इसी स्थल पर महात्मा बुद्ध ने’ संघ ‘ की स्थापना कर अपने पाँच साथियों एवं बनारस के श्रेष्ठियश को संघ के सदस्य बनाये थे. मौर्यकालीन शासक अशोक ने एक विशाल स्तम्भ’ सारनाथ-स्तम्भ ‘ का निर्माण स्मारक के रूप में किया था जिसे स्वतन्त्र भारत के राजचिह्न के रूप में स्वीकारा गया है.

राजगृह प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

राजगृह को राजगीर या गिरिव्रज के नाम से भी जाना जाता था. सोलर महाजनपदों में प्रसिद्ध महाजनपद’ मगध ‘ की प्राचीन राजधानी राजगृह थी. बाद में राजगृह के स्थान पर पाटलिपुत्र हो गई थी.

राजगृह के सम्बन्ध में पालि साहित्य में विशद् वर्णन मिलता है, बिम्बिसार, अजातशत्रु हर्यक वंश के शासकों, नन्दवंश एवं शिशुनाग वंश के शासकों ने राजगृह की उननति के लिए निरन्तर कार्य किये थे. बनारस से महात्मा बुद्ध ने धर्म प्रचार के लिए राजगृह में प्रवेश किया था,

जहाँ पर प्रारम्भ में उन्हें प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा था. कालान्तर में बिम्बिसार, अजातशत्रु जैसे शासकों में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था. वर्तमान में यह एक छोटा नगर राजगीर है जी पटना जिले में अवस्थित है.

ई. पू. छठी शताब्दी में बिम्बिसार द्वारा इसका निर्माण कराया गया था. वर्तमान में इसे गर्म जल स्रोतों के कारण जाना जाता है

महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात् 483 ई. में अजातशत्रु के काल में राजगृह की शापर्णि नामक गुफा में ही प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था. प्रथम बौद्ध संगीति की अध्यक्षता बौद्ध भिक्षु ‘ महाकश्यप’ ने की थी.

कुशीनगर प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

कुशीनगर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में अवस्थित है. ‘ कसिया’ कहा जाता है. यहाँ पर महात्मा बुद्ध का परिनिर्वाण बुन्द नामक सुनार के घर भोजन करने से हो गया था. महात्मा बुद्ध की मृत्यु को परिनिर्वाण कहा गया है. गणतान्त्रिक राज्य मल्ल के एक भाग की राजधानी कुशीनगर था.

यहाँ के मल्लों की वीरता की प्रशंसा साहित्यिक स्रोतों में मिलती है. अशोक के आठवें वृहद् शिलालेख, दीर्घनिकाय, दिव्यावदान, फाह्यान एवं ह्वेनसांग के विवरणों में कुशीनगर का उल्लेख किया गया है.

कनिष्क के बिहार एवं अशोक के स्तूपों का यहाँ पर निर्माण कराया गया था. परिनिर्वाण चैत्य में गुप्तकालीन 20 फुट की महात्मा बुद्ध की मूर्ति उत्कृष्टतम कला का नमूना है.

वैशाली प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

सोलह महाजनपदों में प्रसिद्ध गणतान्त्रिक राज्य वज्जि या वृज्जि संघ के लिच्छवि कुल की राजधानी वैशाली थी. वज्जि आठ गणराज्यों का समूह था, जो मगध के उत्तर में अवस्थित था. जैन धर्म के स्वामी महावीर का जन्म वैशाली के समीप कुण्डग्राम में ही हुआ था.

उनके पिता सिद्धार्थ वज्जि महाजनपद के ज्ञातुंक कुल के गणराज्य थे. प्राचीनकालीन प्रख्यात नृत्यांगना आम्रपाली वैशाली में रहती थी, जिसे महात्मा बुद्ध ने स्वयं वैशाली जाकर बौद्ध धर्म की दीक्षा प्रदान की थी. शिशुनाग के शासन काल में 383 ई. पू. द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था.

इसी दौरान वैशाली में मतभेदों के कारण स्थविर और महासांधिक नामक दो वर्गों का अविर्भाव हुआ था. गुप्तशासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राज्यपाल का कार्यालय वैशाली में ही अवस्थित था. कालान्तर में अजातशत्रु ने इस पर आक्रमण कर मगध साम्राज्य में मिला लिया था.

पाटलिपुत्र प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

पाटलिपुत्र आधुनिक पटना है, जो बिहार की राजधानी है. पाँचवीं शताब्दी ई. पू. उदयिन ने इसे बसाया था. शेरशाह सूरी ने सोलहवीं शताब्दी में इसका पुनर्निर्माण कर ‘ पटना ‘ नामकरण किया था.

गंगा और सोन के संगम पर पाटलिपुत्र अवस्थित था. मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र मील 9/1.2(15-2 किमी) लम्बा एवं) 1/2मील (0.8 किमी) चौड़ा था. नगर की सुरक्षा के लिए लकड़ी की चहारदीवारी बनाई गई थी, जिसमें छोटे-छोटे छिद्र थे. चारों ओर एक गहरी खाई (600 फुट चौड़ी एवं 60 फुट गहरी) बनी हुई थी.

दीवारों पर 570 बुर्ज बने हुए थे एवं नगर में प्रवेश के लिए 64 द्वार बने हुए थे. इस नगर की प्रशंसा अनेक यूनानी लेखकों ने की है. फाह्यान इस महल को देवताओं द्वारा बनाया हुआ मानता था.

पाटलिपुत्र में अशोक के शासनकाल में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी. भारतीय यवन शासक मिनाण्डर एवं उड़ीसा के एक खारवेल ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया था. यह शुंग और कण्व वंश के शासकों की भी राजधानी रही थी.

पावापुरी प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

  • महाजनपदों में प्रसिद्ध गणतान्त्रिक राज्य मल्ल के दूसरे भाग की राजधानी पावापुरी थी. कुछ विद्वानों के अनुसार

पावापुरी वर्तमान बिहार के नालंदा में अवस्थित है, जबकि कुछ इसे गोरखपुर के दास स्थित पावै या पडरौल नामक स्थल मानते हैं. 469 ई. पू. 72 वर्ष की अवस्था में धर्म प्रचार करते समय महावीर स्वामी का निर्वाण पावापुरी में ही हुआ था.

तक्षशिला  प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

वर्तमान में तक्षशिला पाकिस्तान के रावलपिण्डी जिले में अवस्थित है. प्राचीनकाल में यह आयुर्वेद चिकित्सा केन्द्र के रूप में ख्याति प्राप्त था. सिकन्दर के आक्रमण काल के समय पर राजा आम्बि की राजधानी थी.

राजा बिम्बिसार के प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक के यहाँ पर चिकित्सा का प्रशिक्षण लिया था. 43-44 ई. में अपोलोनियस नामक यूनानी यात्री ने तक्षशिला का भ्रमण कर विस्तृत वृत्तान्त लिखा था.

अशोक के काल में तक्षशिला अमरापथ प्रान्त की राजधानी थी. सातवीं शताब्दी के दौरान तक्षशिला कश्मीर का हिस्सा बन गया था. प्राचीन शिक्षा केन्द्र के रूप में ‘ तक्षशिला विश्वविद्यालय’ की ख्याति सम्पूर्ण विश्व में थी.

जहाँ पर पाणिनी, कौटिल्य, पतंजलि आदि महान् विद्वानों ने शिक्षा ग्रहण की थी. ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सुल्तान महमूद द्वारा पंजाब विजय के पश्चात् तक्षशिला का महत्व अधिक कम हो गया था.

श्रावस्ती प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल श्रावस्ती राप्ती नदी के तट पर अवस्थित था. वर्तमान में यह गोंडा और बहराइच जिलों की सीमा पर उत्तर प्रदेश सहेतमहेत के नाम से पहचाना जाता है.

श्रावस्ती उत्तरी कोशल की आरम्भिक राजधानी थी जो बाद में साकेत या अयोध्या में स्थानान्तरित कर दी गई थी. साहित्यिक स्रोतों में श्रावस्ती का उल्लेख व्यापारिक सन्दर्भ में मिलता है

यह एक धार्मिक नगरी भी थी. यहाँ पर आजीवक सम्प्रदाय के प्रवर्तक मक्खलि गोशाल का जन्म हुआ था तथा जैन धर्म के तीर्थंकर सम्भवनाथ एवं चन्द्रप्रभु का भी यहाँ से हुड़ाव था. श्रावस्ती के साहुकार अनाथपिण्डक ने एक विशाल जेतवन महाविहार बौद्ध संघ को दान में दिया था. बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध ने श्रावस्ती की यात्रा की थी.

नालन्दा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

वर्तमान में नालन्दा बिहार का एक जिला है. नालन्दा बौद्ध धर्म का पाँचवीं-छठी शताब्दी में विश्व प्रसिद्ध शिक्षा का केन्द्र रहा है. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने नालन्दा में भ्रमण कर उसकी प्रशंसा की थी.

ह्वेनसांग के अनुसार गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य ने नालन्दा में एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण कराया था जिसमें 20 फीट ऊँचे ताँबे की बुद्ध की प्रतिमा की स्थापना की थी. नालन्दा में शिक्षा ग्रहण करने के लिए चीन, जावा, श्रीलंका एवं तिब्बत के विद्यार्थी आते थे

यहाँ पर बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अध्ययन विशेष रूप से होता था. नालन्दा विश्वविद्यालय का भवन नौ मंजिल का था. सुमात्रा के शासक ने यहाँ पर एक बिहार का निर्माण कराया था.

मगध प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकाल में मगध वर्तमान दक्षिण बिहार के पटना एवं गया जिलों का एक जनपद था. महाजनपद काल में अंगुत्तर निकाय में वर्णित 16 महाजनपदों में से अधिकतर मगध साम्राज्यवाद के अधीन हो गये थे. प्राचीन भारत में मगध उत्तरी भारतीय राजनीति का एक प्रमुख केन्द्र था.

हर्यक वंश नन्दवंश, शिशुनाग वंश के शासकों ने मगध की उन्नति में महती भूमिका का निर्वहन किया था. मगध की दो राजधानियाँ थीं-राजगृह एवं पाटलिपुत्र. महाभारत एवं पुराणों में मगध के इतिहास का वर्णन किया गया है.

महावीर एवं बौद्ध धर्म प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समय बिम्बिसार मगध का शासक था. चतुर्थ शताब्दी ई. पू. मगध साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में हिन्दुकुश से लेकर पूर्व में कलिंग तक हो गया था.

महिष्मती प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

महाजनपदकालीन भारत में दक्षिण अवन्ति की राजधानी महिष्मती थी. छठी शताब्दी ई. पू. यहाँ पर जनजीवन बस चुका था. बुद्धकाल में अवन्ति में चण्डप्रद्योत का शासन था.

उज्जयिनी के अस्तित्व में आते ही इसका महत्व कम होने लगा था. इसके नगर प्रशासन में व्यापारिक निगमों की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

प्रतिष्ठान प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन प्रतिष्ठान की पहचान वर्तमान में औरंगाबाद जिले के पैठन के रूप में की गई है. यह उत्तरी गोदावरी घाटी में अवस्थित था. महाजनपदकालीन भारत में प्रतिष्ठान अश्मक महाजनपद की राजधानी थी.

यह दक्षिण से उत्तर की ओर जाने वाले व्यापारिक मार्ग दक्षिणापथ पर अवस्थित था. अतः मौर्योत्तरकाल में इसका अत्यधिक व्यापारिक महत्व था.यह प्रारम्भ में सातवाहनों की राजधानी थी.

नागार्जुनकोण्ड प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन नागार्जुनकोण्ड वर्तमान में आन्ध्र प्रदेश के गुण्टूर जिले में अवस्थित है. यह धार्मिक एवं व्यापारिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण नगर था. सातवाहन शासक हाल ने नागार्जुनकोण्ड में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् नागार्जुन के लिए एक बौद्ध विहार का निर्माण कराया था.

यह बौद्ध धर्म की महायान शाखा का प्रमुख केन्द्र था. यहाँ पर शंख की कटाई का उद्योग विस्तृत पैमाने पर होता था.

अपरान्त प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध धार्मिक स्थल अपरान्त को महाराष्ट्र के उत्तरी कोंकणी क्षेत्र से पहचाना गया है. यह अपरान्तक या अपरान्तिक के नाम से जाना जाता है. गौतमीपुत्रशातकर्णी ने अपरान्त पर विजय प्राप्त की थी. महावंश के अनुसार मौर्य शासक अशोक ने अपरान्त में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धर्मरक्षित को भेजा था.

कलिंग प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

पूर्वी समुद्रतटीय क्षेत्र पर महानदी एवं गोदावरी नदियों का मध्यवर्ती क्षेत्र कलिंग था. वर्तमान उड़ीसा की कलिंग के रूप में पहचान की गई है. अशोक ने अपने राज्याभिषेक के

आठवें वर्ष इस पर भयंकर युद्ध के फलस्वरूप आक्रमण कर लिया था. कलिंग युद्ध के बाद ही अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ था और तभी से उसने धम्म के स्वरूप को स्थापित किया था. कालिदास के रघुवंश एवं महाभारत में कलिंग का विवरण मिलता है. कलिंग पर महाभारत काल में चित्रांगद का शासन था.

ओदन्तीपुरी प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन शिक्षा का केन्द्र एवं बौद्ध धर्म की प्रख्यात स्थली, ओदन्तीपुरी बिहार में गया के समीप अवस्थित थी. पाल शासकों ने ओदन्तपुरी की उन्नति में महती भूमिका का निर्वहन किया था.

यहाँ पर एक विशाल पुस्तकालय था जिसमें बौद्ध एवं ब्राह्मण धर्म की पुस्तकें विद्यमान थीं. ओदन्तीपुरी को उड्यन्तपुर भी कहा जाता था. आठवीं शताब्दी के मध्य में बंगाल और बिहार में पालवंश के संस्थापक गोपाल ने यहाँ पर एक महाविहार की स्थापना की थी.

मुंगेर प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

यह बिहार राज्य में अवस्थित प्राचीन स्थल था. मुंगेर अंग महाजनपद का प्रमुख केन्द्र प्राचीनकाल में रहा था. मुंगेर को चन्द्रगुप्त ने स्थापित किया था. यह धार्मिक एवं पर्यटन की दृष्टि से भी उत्कृष्टतम केन्द्र रहा है. कलहगाँव का मन्दिर, मन्दार पहाड़ी एवं नारी गुफा यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल थे.

साँची प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन बौद्ध तीर्थस्थली के रूप में ख्यात साँची वर्तमान में मध्य प्रदेश के रायसिन जिले में अवस्थित है. यहाँ पर बौद्धकालीन शिल्पकला के प्राचीनकालीन सभी साक्ष्य विद्यमान हैं. यहाँ पर प्राचीनकालीन तीन स्तूप हैं.

एक बड़े स्तूप की ऊँचाई 16.4 मीटर है तथा 36.5 मीटर घास का है. इस स्तूप के तोरणद्वार पर बुद्ध के जीवन की झलकियाँ उत्कीर्ण की गई हैं. अन्य दो स्तूपों का निर्माण मौर्य शासक अशोक ने कराया था.

महाबलीपुरम् प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

धर्म, स्थापत्य एवं पर्यटन की दृष्टि से मशहूर महाबलीपुरम् तमिलनाडु के कोरोमण्डल तट पर अवस्थित है. इस नगर का प्राचीन नाम ‘ मामल्लपुरम् ‘ था जिसे राजा नरसिंह वर्मा ने 625-45 ई. में स्थापित किया था. यह नगर सप्तपैगोडा के लिए प्रसिद्ध था, जो चट्टानों को काटकर बनाये गये हैं. शोर-मन्दिर यहाँ का प्रसिद्ध मन्दिर है.

काँची ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन हिन्दुओं की सात पवित्र नगरियों में से एक काँची भी थी. समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तम्भ लेख में व इसका पहला ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है. काँची को वर्तमान।

में कांजीवरम् कहा जाता था, जो प्राचीनकाल में पल्लवों की राजधानी थी. 640 ई. में ह्वेनसांग ने काँची के लिए भ्रमण किया था. ह्वेनसांग के यात्रा विवरण के अनुसार प्राचीनकाल में काँची 5-6 मील के घेरे में बसी एक विशाल नगरी थी. प्रसिद्ध बौद्ध आचार्य धर्मपाल की जन्मस्थली काँची ही थी.

शिक्षा एवं निवास की दृष्टि से वैष्णव धर्म के आचार्य रामानुज का काँची से गहरा सम्बन्ध रहा था. यहाँ का ‘ कैलाशनाथ का मन्दिर’ सर्वाधिक प्रसिद्ध रहा है.

मदुरा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन भारत के दक्षिणी प्रदेश का मदुरा नगर प्रथम शताब्दी में पाण्डव राज्य की राजधानी था. कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में मदुरा के सुन्दर सूती वस्त्रों एवं मोतियों का वर्णन किया है. इसमें अनेक भव्य देव मन्दिर हैं जिनमें सुन्देश्वर तथा मीनाक्षी का मन्दिर प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है.

हस्तिनापुर प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

महाभारतकालीन भारत में हस्तिनापुर को प्रसिद्ध नगरों में गिना जाता था. उस काल में हस्तिनापुर पाण्डवों की राजधानी थी. वर्तमान में हस्तिनापुर के अवशेष मेरठ (उ. प्रदेश) के मवाना क्षेत्र के आसपास मिलते हैं. हस्तिनापुर में चित्रित धूसर मृदुभाण्ड एवं लाल मृदुभाण्ड संस्कृति के अवशेष उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए

कावेरीपत्तनम प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

इस प्राचीन स्थल को प्रहार नाम से भी जाना जाता था. यह वर्तमान में तमिलनाडु के सियासी तासुधा में कावेरी नदी तट पर अवस्थित है. कावेरीपत्तनम् संगम युग में चोल राजाओं की राजधानी थी. ‘ पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ में कावेरीपत्तनम् का उल्लेख मिलता है. तृतीय शताब्दी ई. तक कावेरीपत्तनम् एक प्रमुख व्यापारिक बन्दरगाह था.

कामरूप प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

वर्तमान असम जिसे महाभारत में प्राग्ज्योतिषपुर एवं पुराणों में कामरूप कहा गया है. ऋग्वैदिककाल से ही कामरूप का अस्तित्व रहा है. पौराणिक काल में असम पर अधर्म एवं असुरों का शासन था. गुप्त सम्राट् समुद्रगुप्त ने अपने इलाहाबाद स्तम्भ में कामरूप का उल्लेख किया था.

13 वीं शताब्दी में अहोम जाति के लोगों ने इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की एवं यहाँ पर 600 वर्षों तक शासन किया. पौराणिककाल में कामरूप या प्राग्ज्योतिषपुर का प्रसिद्ध राजा नरकासुर था. ईसा की चतुर्थ शताब्दी में कामरूप पर पुष्यवर्मा का शासक था. उसी दौरान समुद्रगुप्त ने कामरूप पर आक्रमण किया था.

इलाहाबाद स्तम्भलेख के अनुसार उस आक्रमण में पुष्यवर्मा ने समुद्रगुप्त के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. ब्रह्मपाल ने कामरूप में तीसरे हिन्दू राजवंश की स्थापना की थी.

प्रयाग प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

गंगा और यमुना के संगम पर अवस्थित प्रयाग वर्तमान में इलाहाबाद के नाम से जाना जाता है. इसे तीर्थराज भी कहा जाता है. गुप्तकालीन शासकों की प्रयाग राजधानी रहा है. सम्राट हर्षवर्द्धन यहाँ पर पाँच वर्ष के अन्तराल से एक सत्र का आयोजन करता था.

चीनी यात्री ह्वेनसांग भी 643 ई. में एक बार प्रयाग हर्षवर्द्धन के सत्र में भाग लेने आया था. यहाँ पर अशोक के स्तम्भ लेख विद्यमान हैं, जो सबसे प्राचीन ऐतिहासिक स्मारक के रूप में प्रयाग में प्राप्त हुए हैं.

प्रयाग का नाम इलाहाबाद 1583 ई में अकबर द्वारा गंगा-यमुना के संगम पर किला बनवाने के उपरान्त रखा गया था.

कन्नौज प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

मूल नाम कान्यकुब्ज के नाम से भी पहचाने जाने वाला उत्तरी भारत का प्राचीनतम् स्थल कन्नौज बौद्ध धर्म के केन्द्र के रूप में ख्याति प्राप्त स्थल रहा है. पतंजलि के महाभाष्य में कन्नौज का वर्णन मिलता है. महाभारत में भी इसका उल्लेख किया गया है. चीनी यात्री फाह्यान 405 ई. में कन्नौज में आया था तथा वहाँ के दो बौद्ध विहारों का निरीक्षण किया था

. ह्वेनसांग कन्नौज में सात वर्षों तक ठहरा था. सम्राट हर्षवर्द्धन ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया था. समृद्धि एवं ऐश्वर्य के फलस्वरूप इस नगर को ‘ महोदयश्री’ कहा जाता था. 816-1090 ई. में प्रतिहार शासकों ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया था.

उस दौरान कन्नौज उत्तरी भारत का प्रमुख नगर बन गया था. यहाँ का अन्तिम प्रतिहार शासक राजपाल था जिसे चंदेल राजा गण्ड ने अपदस्थ कर दिया था. कन्नौज का अन्तिम राठौड़ शासक जयचन्द था जो मुहम्मद गौरी के हाथों मारा गया था.

गिरनार प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

काठियावाड़ (गुजरात) में जूनागढ़ के निकट स्थित गिरनार ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थल है. यह पर्वतीय स्थल है. गिरनार में मौर्य सम्राट अशोक ने चट्टानों पर चतुर्दश शिलालेख उत्कीर्ण कराया था.

अशोक के चतुर्दश शिलालेख के दूसरी तरफ शक शासक रुद्रदामन का अभिलेख है जिसमें वहाँ पर सुदर्शन झील का निर्माण सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वारा कराये जाने का उल्लेख है. गिरनार में चालुक्य राजाओं द्वारा निर्मित कई मंदिर विद्यमान हैं.

महोबा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन स्थल महोबा उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में अवस्थित है. प्रारम्भ में यह चंदेल वंश के शासकों की राजधानी थी, जिन्होंने महोबा पर नवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक राज्य किया था.

महोबा को प्राचीनकाल में जेजाकभुक्ति या जुझौती भी कहा जाता था. चन्देल शासकों ने महोबा में कई सुन्दर मन्दिरों का निर्माण कराया था.

गढ़मुक्तेश्वर प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन धार्मिक स्थल गढ़मुक्तेश्वर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में गंगा नदी के तट पर अवस्थित है. प्राचीनकालीन भारत में गढ़मुक्तेश्वर हस्तिनापुर का एक भाग था. यहाँ पर मुक्तेश्वर शिव का मन्दिर एवं प्राचीन शिवलिंग कारखण्डेश्वर अवस्थित है.

गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा को एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है.

गौड़ प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध भारतीय प्राचीन स्थल गौड़ का उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी, कौटिल्य के अर्थशास्त्र एवं पुराणों में मिलता है. अनुसंधानों के आधार पर गौड़ को पश्चिमी एवं पश्चिमोत्तर बंगाल का भाग माना है. गुप्त शासकों के पतन के पश्चात् गौड़ शासकों का अस्तित्व सिद्ध हुआ था.

गौड़ के शासकों में समाचार देव एवं गोपचन्द्र का नाम उल्लेखनीय है. इन दोनों शासकों ने गौड़ की सैनिक शक्ति का विस्तार किया था. सातवीं शताब्दी में गौड़ नरेश शशांक ने थानेश्वर के पूज्य मूर्तियाँ शासकों से युद्ध लम्बे अन्तराल तक युद्ध किया था. द्वितीय पाल नरेश धर्मपाल के समय गौड़ उत्तरी भारत की प्रमुख शक्ति के रूप में उभरकर सामने आया था.

थानेश्वर  प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रख्यात प्राचीन नगर थानेश्वर वर्तमान में दिल्ली के उत्तर में अम्बाला एवं करनाल के मध्य अवस्थित है. संस्कृत साहित्य में थानेश्वर का वृहद् उल्लेख मिलता है. इसे ब्रह्मावर्त क्षेत्र का केन्द्र बिन्दु माना जाता था. विद्वानों के अनुसार यहाँ पर भारतीय आर्यों का सबसे पहले विस्तार हुआ था.

इस स्थल को थानेश्वर भी कहा जाता था. छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में थानेश्वर पुष्यभूति वंश के शासकों की राजधानी बना था. पुष्यभूति शासक प्रभाकरवर्धन ने थानेश्वर को मालवा, उत्तर-पश्चिमी पंजाब, राजपूताना का केन्द्रीय नगर बनाया था. तृतीय मराठा युद्ध के पश्चात् यह ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया था.

नासिक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थस्थल एवं प्राचीन नगर महाराष्ट्र में गोदावरी के तट पर अवस्थित था. शक क्षत्रप नहपान की नासिक राजधानी रहा था. यहाँ पर बौद्ध जैन एवं हिन्दू धर्म के अवशेष मिले हैं.

चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय एवं प्रारम्भिक राष्ट्रकूटों के काल में नासिक उत्कर्ष पर रहा या. राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष ने नासिक के स्थान पर मान्यखेट को अपनी राजधानी बनाया था, उसी समय से इसका महत्व कम होने लगा था.

मान्यखेट प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल एवं प्राचीन नगर मान्यखेट को वर्तमान में मालखेड़ के नाम से जाना जाता है. यहाँ पर कई जैन मंदिर हैं. राष्ट्रकूट अमोघवर्ष ने मान्यखेट को अपनी राजधानी बनाया था.

मास्की प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन भारत का प्रमुख ऐतिहासिक नगर आन्ध्र प्रदेश के रायचूर जिले में अवस्थित है. मास्की में प्राप्त अभिलेख के द्वारा ही मौर्य सम्राट अशोक की पहचान की गई है. मास्की से प्राप्त अभिलेख में ‘ देवानाम् पियदस्सी के साथ अशोक भी लिखा हुआ मिला है, जो मात्र इसी स्थल से प्राप्त हुआ है.

कूच बिहार प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

तोरसा नदी के किनारे पर अवस्थित यह स्थल बंगाल प्रान्त के अन्तर्गत एक जिला नगर है. तिस्ता एवं संकोश नदियाँ ब्रह्मपुत्र में मिलने से पूर्व कूच बिहार में होकर प्रवाहित होती हैं. कोच नामक कबायलियों के आधार पर इसका नामकरण हुआ था. कालान्तर में कूच बिहार के शासकों को क्षत्रिय समझा जाने लगा था.

यह स्थल प्रारम्भ में कामरूप के प्राचीन हिन्दू शासकों के राज्य का एक हिस्सा था. भास्कर वर्मा के काल में यह राज्य करतीया तक विस्तृत था. 1950 में कूच बिहार का विलय भारतीय गणतन्त्र में हो गया जो पश्चिम बंगाल का एक जिला नगर है.

एलोरा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध धार्मिक एवं स्थापत्य कला के उत्कृष्टतम् केन्द्र के रूप में ख्याति प्राप्त एलोरा वर्तमान में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में अवस्थित है. यह शैलकृत गुफाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है. एलोरा में लगभग 34 शैलकृत गुफाएँ हैं.

इन गुफाओं में 16 गुफाएँ हिन्दू धर्म से, 12 गुफाएँ बौद्ध धर्म से एवं 6 गुफाएँ जैन धर्म से सम्बन्धित शैलकृत गुफाएँ हैं. चालुक्य एवं राष्ट्रकूट शासकों ने इन गुफाओं का निर्माण कराया था. एलोरा गुफा का कैलाश नामक मन्दिर जिसे राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने बनाया था, जो स्थापत्य कला का सर्वोत्कृष्ट नमूना है.

एहोल प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन ऐतिहासिक स्थल एहोल कर्नाटक में बीजापुर के बादामी क्षेत्र के समीप अवस्थित है. एहोल को ‘ मन्दिरों का नगर ‘ कहा जाता है. इस ऐतिहासिक स्थल में लगभग 70 मन्दिरों के अवशेष मिले हैं. यहाँ पर पुलकेशिन द्वितीय का एक प्रशस्ति अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें उसकी विजय का वर्णन मिलता है.

अजन्ता प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में पर्वतीय क्षेत्र में अजन्ता अवस्थित है. अजन्ता में 29 गुफाएँ निर्मित हैं. अजन्ता की गुफाओं में मानव जीवन, प्राकृतिक चित्रण, पशु पक्षियों के बहुरंगी चित्रण उकेरे गये हैं. इन चित्रों की रचनाएँ पाँचवीं से सातवीं शताब्दी के मध्य हुईं. अजन्ता के चित्रों में अलंकरण कला का प्रदर्शन है जो तत्कालीन यूरोपियन एवं इतालवी कला से भी श्रेष्ठ है.

बोधगया प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल बिहार में गया के समीप अवस्थित है. बोधगया। भगवान् बुद्ध की ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. यहाँ पर एक पीपल का वृक्ष था, जिसे बोधि वृक्ष कहा जाता था. बोध गया। बुद्ध एक विशाल कलात्मक मंदिर है एवं इसके पीछे एक पत्थर का चबूतरा है

जिसे बौद्ध सिंहासन कहा जाता है. इस स्थल पर गौतम बुद्ध ने अपने पाँच कौण्ड्रिन्यादि साथियों के साथ बैठकर तपस्या की थी. मौर्य सम्राट अशोक अपने राज्याभिषेक के दसवें वर्ष में बोधगया गया था. इस आशय का साक्ष्य अशोक के आठवें स्तम्भ लेख में मिलता है.

समुद्र गुप्त के शासनकाल में सिंहलद्वीप के राज्य मेघवर्णन ने समुद्र गुप्त को अनुमति से बोधगया में एक विहार का निर्माण कराया था. चीनी यात्री फाह्यान के समय यह स्थल जंगलों से घिरा हुआ था, यह वर्णन फाह्यान ने अपने यात्रा विवरण में किया था.

गौड़ के शासक शशांक ने बोधगया के बोधिवृक्ष को काटकर जला दिया था. ह्वेनसांग के अनुसार मगध के स्थानीय शासक पूर्ण वर्मा द्वारा यहाँ पर दूसरा वृक्ष लगवाया था. वर्तमान में बोधि वृक्ष के स्थान पर एक सुन्दर विश्रामालय बना दिया गया है

बैराठ प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध प्राचीनकालीन भारतीय स्थल बैराठ वर्तमान में राजस्थान में शाहपुरा के पास अवस्थित है. इसे बैराठ के नाम से ही जाना जाता है. यह राजा विराट की राजधानी थी. इसी शासक के नाम पर दूसरा नामकरण बैराठ किया गया था. यह मत्स्य महाजनपद के अन्तर्गत आता था.

विभिन्न अनुमानों के अनुसार यहाँ पर चेदियों का नियन्त्रण था. कालान्तर में यह मगध साम्राज्य का अंग बन गया था. इसका उल्लेख महाभारत व थ में मिलता है. ई. पू. 300 के बौद्ध चैत्य के 26 आष्टपावीय स्तम्भ भग्नावशेष में यहाँ पर उपलब्ध है. यह ऐतिहासिक स्थल शिल्पकला का उत्कृष्टतम उदाहरण है.

खजुराहो प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

कलात्मक, स्थापत्वपूर्ण धार्मिक स्थल खजुराहो वर्तमान या में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में अवस्थित है. यहाँ पर भी अनेक मन्दिर विद्यमान हैं जिनमें कन्दरिया महादेव का मन्दिर, चतुर्भुज मन्दिर, चौंसठ योगिनी मंदिर, पार्श्वनाथ का मन्दिर, जगदम्बा मन्दिर, चित्रगुप्त सूर्य मन्दिर

वामन मन्दिर, ब्रह्मा मन्दिर एवं घंटई मन्दिर विश्व में ख्याति प्राप्त मन्दिर हैं, शृंगारिक चित्रण से युक्त यहाँ की मूर्तियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं. खजुराहो चंदेलों की धार्मिक राजधानी थी.

ब्रह्मगिरि प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक स्थल ब्रह्मगिरि वर्तमान में कर्नाटक राज्य के चित्रदुर्ग जिले में अवस्थित है. ब्रह्मगिरि से नव-पाषाणकालीन ऐतिहासिक साक्ष्य उत्खनन से प्राप्त हुए हैं.

प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों में शंख, सीसा, सोना, चूड़ियाँ एवं काँसे की अंगूठियाँ प्राप्त हुई हैं. ब्रह्मगिरि से मौर्योत्तरकालीन पोटीन के सिक्के भी प्रापत हुए हैं.

अमरावती प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्राचीन भारतीय स्थल अमरावती आन्ध्र प्रदेश के गुंटुर जिले में अवस्थित है. प्रारम्भिककाल में यह प्रसिद्ध बौद्ध धर्म स्थल रहा है. सातवाहन शासकों के काल में अमरावती में मूर्तिकला एवं चित्रकला का सर्वाधिक विकास हुआ था. अमरावती से प्राप्त मूर्तियों एवं कला चित्रों में पेड़-पौधों एवं फूलों को बड़े विशिष्ट ढंग से चित्रित किया गया है

अमरावती शैली को मथुरा एवं गांधार शैली से पूर्व की शैली माना गया है. अमरावती की चित्राकृतियों पर यूनानी प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता.

भड़ौंच  प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन विदेशी व्यापारिक केन्द्र भड़ौंच नर्मदा एवं ताप्ती नदियों के मध्य अवस्थित था. हिन्दू धर्म ग्रन्थों में इसे भृगुकच्छ के रूप में प्रकाशित किया है, जबकि ‘ पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ में इसका नाम ‘ वैरीगाल’ रखा गया है. यह प्राचीन भारत का प्रवेश द्वार भी कहा जाता था.

अनुश्रुतियों के अनुसार भृगु ऋषि ने भड़ौंच में अपनी तपस्या पूरी की थी. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस स्थल की यात्रा की थी. उत्खनन के दौरान भड़ौंच से काँच की वस्तुएँ, रोमन मुद्राएँ एवं टेराबोरा की वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं.

श्रवणबेलगोला प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

यह ऐतिहासिक स्थल कर्नाटक राज्य के हासन जिले में अवस्थित है. चन्द्रबेत एवं इन्द्रदेव नामक पहाड़ियों के मध्य श्रवणबेलगोला स्थित हैं. गंग शासक रचमल्ल के शासनकाल में चामुण्डराये नामक मंत्री श्रवणबेलगोला में 983 ई. में बाहुबली गोमतेश्वर की विशालकाय मूर्ति का निर्माण कराया था.

यह प्रतिमा 56 फीट से भी अधिक ऊँची है. वर्तमान में भी इस स्थल को जैन धर्म का तीर्थस्थल माना जाता है.

अंतरजीखेड़ा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रागैतिहासिक स्थल अंतरजीखेड़ा उत्तर प्रदेश के एटा जिले में गंगा की सहायक नदी काली के तट पर अवस्थित है. अलेक्जेण्डर कनिंघम ने 1961-62 ई. में इस स्थल को खोजा था. यहाँ पर चित्रित धूसर मृद्भाण्ड, काले लाल मृद्भाण्ड एवं उत्तरी ओपदार काले मृद्भाण्डों को अवशेष के रूप में प्राप्त किया गया है. इसका उल्लेख ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में मिलता है.

कन्याकुमारी  प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रख्यात प्राचीन ऐतिहासिक स्थल कन्या कुमारी सुदूर दक्षिण में समुद्र तट पर अवस्थित है. यह स्थल भारतीय अन्तरीप का अन्तिम छोर है. तमिल में कन्याकुमारी को कन्निकुमारी कहा जाता है. पद्मपुराण में कन्याकुमारी को कन्यातीर्थ कहा गया है.

इसके पास कुमारी नामक एक नदी प्रवाहित होती है. चोल शासक कुलोत्तुंग का कन्याकुमारी से एक अभिलेख भी प्राप्त हुआ है. यहाँ का कुमार देवी का मन्दिर विश्व प्रसिद्ध स्थापत्य का नमूना है.

कजंगल प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

महाजनपदकालीन ऐतिहासिक स्थल कजंगल वर्तमान बिहार के राजमहल जिले में स्थित कपंगल गाँव है. इसका आविर्भाव अंग महाजनपद के विकास के दौरान हुआ था. मिलिन्दपज्हो के अनुसार बौद्ध दार्शनिक नागसेन का कजंगल में ही हुआ था.

हर्षवर्द्धन ने कजंगल में जयस्कन्धावार का निर्माण कराया था, ह्वेनसांग ने इस स्थल का उल्लेख का-चु वेन-की-सो के रूप में किया है.

धौली प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्राचीन भारतीय स्थल धौली वर्तमान में उड़ीसा राज्य में पुरी जिले में अवस्थित है. तौशाली इसी स्थल का नाम था. यहाँ से पकाई गई ईंटें, काले चमकदार मृद्भाण्ड एवं मौर्यकालीन उपकरण अवशेष के रूप में प्राप्त हुए हैं.

मौर्य सम्राट अशोक का वृहद् शिलालेख यहाँ से प्राप्त हुआ है. अशोक के इस वृहद् शिलालेख में 14 अभिलेख लिखे गए हैं.

द्वारसमुद्र प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

दक्षिणी कर्नाटक में प्राचीन स्थल द्वारसमुद्र अवस्थित है. प्राचीन भारत में द्वारसमुद्र होयसल शासकों की राजधानी थी. यहाँ की कला शैली प्राचीनकाल से प्रसिद्ध रही है. द्वार समुद्र की वास्तुकला एवं स्थापत्य ‘ बेसर शैली’ से सम्बन्धित था.

‘ होयसलेश्वर मंदिर’ इस शैली का प्रसिद्ध स्थापत्य है. द्वार समुद्र का होयलेश्वर मन्दिर भगवान् शिव को समर्पित है. जिसकी बाहरी दीवारों पर पौराणिक गाथाओं का चित्रांकन किया गया है।

एरण प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक स्थल एरण मध्य प्रदेश के सागर जिले में अवस्थित है. महाजनपदकालीन भारत में एरण चेदि महाजनपद का एक अंग था. यहाँ पर तीसरी शताब्दी में जनजीवन होने के प्रमाण मिले हैं. एरण से 510 ई. का भानुगुप्त का अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें प्रथम बार सती प्रथा के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं.

कल्याण प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीनकालीन भारत का एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र के रूप में पहचाना जाने वाला कल्याण वर्तमान में महाराष्ट्र के पश्चिमी तट पर मुम्बई के निकट थाना जिले में अवस्थित है. सातवाहनकाल में कल्याण विदेशी व्यापार का एक प्रमुख बन्दरगाह था.

अज्ञात नाविक द्वारा लिखित ‘ पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ में कल्याण का उल्लेख ‘ कैसियाना’ नाम से किया गया है. कल्याण से काँसा, लकड़ी एवं वस्त्र का व्यापार होता था. 14 वीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों ने इसका नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया था. छठी शताब्दी में कल्याण की गिनती छह प्रमुख व्यापारिक नगरों में होती थी.

नवदाटोली प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

ई.पू. 1600 की सभ्यता का प्राचीन स्थल नवदाटोली वर्तमान में मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी में अवस्थित है. इसकी खोज उत्खनन से 1957-59 में की गई थी. C-14 वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार इस क्षेत्र का काल 1600-1300 ई. पू. निर्धारित किया गया है. यहाँ से प्राप्त मृद्भाण्डों को ‘ मालवा मृद्भाण्ड ‘ भी कहा जाता है.

तंजौर प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

तंजावुर एवं तंजौर के नाम से ख्यात यह नगर वर्तमान में चेन्नई से 218 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम में कावेरी नदी के तट पर अवस्थित है. यह चोल साम्राज्य की राजधानी के रूप में ख्याति प्राप्त थी. तंजौर में लगभग 75 मंदिर हैं.

चोल शासक राजराजे द्वारा बनवाया गया वृहदेश्वर मंदिर 100 फीट ऊँचा है और उसके शिखर तक जाने के लिए 14 मंजिलें हैं. यह मंदिर विश्वविख्यात मंदिरों में गिना जाता है. वृहदेश्वर मंदिर को ‘ राजराजेश्वर मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है. इस स्थल से होयसल शासक सोमेश्वर एवं रामनाथ के अभिलेख प्राप्त हुए हैं.

उदयगिरि प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक स्थल उदयगिरि मध्य प्रदेश के रायसीन जिले में अवस्थित है. यह बेतवा एवं बेश नदियों के मध्य स्थित है. प्राचीनकाल में उदयगिरि विदिशा का एक उपनगर था. यहाँ पर जैन एवं हिन्दू प्रतिमाओं से युक्त लगभग बीस गुफाएँ हैं. चन्द्रगुप्त द्वितीय का उदयगिरि गुहालेख में इस पहाड़ी का विशिष्ट शैली में वर्णन किया गया है.

कर्णसुवर्ण प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

वर्तमान में कर्णसुवर्ण बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है. चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने कर्णसुवर्ण का विस्तृत विवरण अपने यात्रा-वृत्तान्त में किया है. गौड़ नरेश शशांक यहाँ का शासक था. कालान्तर में कामरूप के भास्करवर्मन ने कर्णसुवर्ण पर अधिकार कर लिया था.

निधानपुर ताम्रपत्र लेखों में भी कर्णसुवर्ण का उल्लेख किया गया है. सेन वंश के शासकों ने कर्णसुवर्ण को बंगाल की राजधानी बनाया था. यहाँ से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों से व्यापार किया जाता था.

नोह प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

पुरातनकालिक सभ्यता का केन्द्र नोह राजस्थान के भरतपुर जिले में आगरा रोड पर अवस्थित है. नोह नामक इस स्थल से चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं. इस स्थल से मिट्टी की मूर्तियाँ, ताँबे के ढलवाँ सिक्के, मिट्टी एवं पत्थर के मनके तथा मौर्यकालीन मूर्तियाँ उत्खनन से प्राप्त हुई हैं.

नोह में लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं जिससे ज्ञात होता है कि नोह के लोग लोहे से परिचित थे एवं उसका प्रयोग हथियार, उपकरण तथा आभूषण बनाने में करते थे. इस स्थल से कुषाण शासक हुविष्क एवं वासुदेव के सिक्के तथा शुंगवंशीय यक्ष-यक्षणियों की मूर्तियाँ उत्खनन से प्राप्त हुई हैं. यहाँ पर ताँबे के उपकरण भी खोजे गए हैं.

गया प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्रख्यात प्राचीनकालीन ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल गया बिहार राज्य में अवस्थित है. जनश्रुतियों एवं प्रारम्भिक ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार गया एक राक्षस गयासुर का निवास

नगर प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन सभ्यता का ऐतिहासिक स्थल नगर वर्तमान में राजस्थान के टोंक जिले में अवस्थित है. इस स्थल के उत्खनन से एक प्राचीन विकसित सभ्यता की जानकारी प्राप्त हुई है. विभिन्न तथ्यों के आधार पर महाभारत में वर्णित मालवों की राजधानी कार्कोट की तुलना एवं साम्यता नगर से की गई है.

यहाँ पर ईसा की प्रथम से तृतीय शताब्दी के मध्य के पुरावशेष-लौह उपकरण, आभूषण, मुद्राएँ, मिट्टी के बर्तन एवं अन्य कई वस्तुएँ उत्खनन से प्राप्त हुई है. नगर में कई आहत सिक्के एवं एक ‘ मालवा नाम जपः’ के नाम से अंकित लेख प्राप्त हुआ है.

विक्रमशिला प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन ‘ महाविहार’ विक्रमशिला वर्तमान में बिहार के भागलपुर जिले में अवस्थित है. यह गंगा नदी के किनारे पर स्थित है. पाल शासक धर्मपाल ने विक्रमशिला महाविहार की स्थापना की थी,

जो कालान्तर में एक विश्वविद्यालय के रूप में परिणित हो गया था. विक्रमशिला में लगभग 160 विहार थे. ‘ आतिश दीपंकर’ प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् इसी महाविहार से सम्बन्धित थे. तेरहवीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला के इस महाविहार को पूर्णतः नष्ट कर दिया था.

गढ़वा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन भारत का प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्रोत एवं महत्वपूर्ण स्थल गढ़वा वर्तमान में उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के करछना नगर के समीप अवस्थित है. गढ़वा से गुप्तकालीन शासकों के कई अभिलेख प्राप्त हुए हैं.

दो कुमारगुप्त, एक स्कन्दगुप्त स तथा एक चन्द्रगुप्त का लेख गढ़वा में खोजा गया है. इसमें से। एक अभिलेख में ‘ अनन्तस्वामित्व’ नामक मूर्ति की स्थापना य का उल्लेख किया गया है.

जुनार प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन ऐतिहासिक स्थल जुनार वर्तमान में महाराष्ट्र में पुणे से 48 किमी उत्तर में अवस्थित है. यहाँ पर 150 शैलकृत गुफाएँ खोजी गई हैं. जुनार की एक शैलकृत गुफा में शकवंशीय शासक नहपान के मंत्री अयम का अभिलेख प्राप्त हुआ है. इस अभिलेख में नहपान के लिए महाक्षत्रप शब्द का प्रयोग किया गया है.

जुनार में खोजी गई शैलकृत गुफाओं में 10 चैत्य एवं 140 विहार हैं. इस क्षेत्र का काल ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी माना गया है. शैलकृत गुफाएँ समूहों में बनी हुई हैं जिनमें तलुजा एवं गणेश पंक्ति को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है. जुनार में प्राप्त चैत्यगृह आयताकार हैं

जिनकी छत समतल एवं मण्डप स्तम्भों से रहित है. ऐतिहासिक दृष्टिकोण के अनुसार यह बौद्ध धर्म के हीनयान एसम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था.

आलमगीरपुर प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

प्राचीन सभ्यता का ऐतिहासिक स्थल आलमगीरपुर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिण्डन नदी के किनारे पर अवस्थित है. आलमगीरपुर में हड़प्पा संस्कृति के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं.

आलमगीरपुर के प्रथम उत्खनन से पतनोन्मुख हड़प्पा संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं. दूसरे उत्खनन के दौरान इस स्थल से चित्रित धूसर मृद्भाण्ड, काले लाल मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं.

इस स्थल से अस्थियों के तीर, चाक से बनाई हुई पक्की मिट्टी की वस्तुएँ, फलक, काँच के मनके आदि प्राप्त हुए हैं.

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