Pablo Picasso पाब्लो पिकासो

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) की जीवनी

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) (1881-1973) आधुनिक कलाकारों में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के समान अपरिमित यश व असामान्य ख्याति प्राप्त करने का सौभाग्य किसी अन्य कलाकार को नहीं मिला।

उन्होंने अपनी कला में सभी प्रमुख आधुनिक कलाशैलियों को प्रयोगान्वित करके प्रभावी कलाकृतियों का निर्माण किया। पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)की कला की सबसे प्रमुख विशेषता है असाधारण परिवर्तनशीलता जिस वजह से पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)की कला का वर्गीकरण करना बहुत कठिन हो गया है

एवं उनको अलौकिक प्रतिभा के महान् कलाकार मानते हैं। उन्होंने चित्रकला के अतिरिक्त मूर्तिकला, एन्गेविंग, लिथोग्राफी, सेरेमिक्स वगैरह भिन्न माध्यमों से उत्कृष्ट कलाकृतियाँ निर्माण की हैं। पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)की कलाकृतियों में विविधता होते हुए वे सब पूर्वनियोजित दृष्टिकोण से बनायी गयी हैं।

इस विचार से हम उनको ध्येयवादी कलाकार मान सकते हैं। किन्तु उनका ध्येयवाद बाह्य आदर्शों पर निर्भर न होकर स्वयं-प्रेरित है; उनकी प्रेरणा का मूल स्रोत है निजी सर्जनशक्ति का पूर्ण विश्वास। पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)का जन्म स्पेन के मलागा नाम के गाँव में हुआ।

उनके पिता होसे रुइथ चित्रकार एवं स्थानीय विद्यालय में चित्रकला के अध्यापक थे। उनकी माता का नाम था मराया पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)रुइथ। 1900 तक पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)अपने चित्रों पर ‘ पाब्लो रुइथ पिकासो’ नाम से हस्ताक्षर करते थे

किन्तु उसके पश्चात् उन्होंने केवल ‘ पिकासो’ लिखना शुरू किया। पाब्लो पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के बचपन के चित्र देखने से ही पता चलता है कि उनको चित्रकला की अद्भुत देन थी। ‘ वृद्ध युग्म’ (1891), ‘ पैर का अध्ययन-चित्र’ (1893) व डोंन होसे का व्यक्ति चित्र पूर्ण विकसित कला सामर्थ्य के उदाहरण है

आयु के 14 वे साल में बार्सिलोना चित्रकला संस्था की प्रवेश परीक्षा वे एक ही दिन में सभी चित्र पूर्ण करके उ त्तीर्ण हुए जिसके लिए अन्य विद्यार्थियों को करीब 1 महीने तक परिश्रम करने पड़ते बार्सलोना मैं अध्ययन करने के पश्चात वे 1897 मैं माड्रिड के शान फर्नांडो अकादमी मैं अध्ययन करने लगे

किंतु वहां वे प्राडो संग्रहालय जाकर वेलास्केस एलग्रेको व तिशेन के चित्रों का निरीक्षण करना अधिक पसंद करते यहां उनका साहित्यकारों और कलाकारों का मंत्रिमंडल बढ़ रहा था वे सब 4 बिल्लियां 53 नाम के जलपान गृह मैं सम्मिलित होते एवं उनकी काला विषयक चर्चाएं होती

उस समय पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के रेखा चित्र वहां की प्रसिद्ध पत्रिका में प्रकाशित होने लगे 1900 मैं वे 2 महीनों तक पेरिस जा कर रहे व वहां उनके तीन चित्र बिक गए 1901 मैं पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)ने युवा कला 54 नाम की पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया किंतु

अब पेरिस का आकर्षण बढ़ता जा रहा था और उसी साल उन्होंने पेरिस में अपने चित्रों की प्रदर्शनी की इस प्रदर्शनी का आयोजन आम्ब्राज वोलार ने किया था वह उसमें पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के 75 चित्र थे इन चित्रों में लोत्रेक व प्रभाववाद का अनुसरण था।

किन्तु पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)अनुसरण कर रहे थे ऐसे समझना भूल होगी; वे केवल बाह्य प्रभावों को आत्मसात करके अपनी व्यक्तिगत कला को सामर्थ्यवान बना रहे थे। इस बात का प्रमाण उनके उसी. साल नयी व पूर्ण स्वतन्त्र शैली में बनाये चित्रों से मिलता है।

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) का नीला काल

इस शैली के चित्र उन्होनें 1901 से 1904 तक बनाये और यही काल उनकी कला का ‘ नीला काल’ 55 कहलाता है। ये चित्र उन्होंने एक ही नीले रंग को प्रमुख स्थान देकर बनाये हैं। चित्रों के विषय हैं भिखारी, रास्तों के गायक, परिश्रमी व पीड़ित लोग व कसरत करने वाले आदमी।

इन चित्रों में से ‘ परित्यक्ता, वृद्ध ज्यू’, ‘ युग्म’ व ‘ इस्त्री करने वाली’ 56 ये चित्र विशेष प्रसिद्ध हैं। चित्रों का दृष्टिकोण मानवतावादी है व उनमें गरीब वर्ग की असहाय व लाचार अवस्था का हृदयद्रावक चित्रण है। 1904 में उनका पैरिस में रहने का विचार पक्का हो गया और उन्होंने पैरिस में नाम की प्रसिद्ध कोठी में जगह ली।

मोमात्र विभाग की टूटी-फूटी बस्ती में ‘ बातो लाव्वा’ यहाँ  पिकासो (Pablo Picasso)ने पाँच साल बड़ी विपन्नावस्था में बिताये किन्तु यह काल आधुनिक कला के विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा। 1902 में उनका कवि माक्स याकोब से व 1904 में आन्द्रे साल्मों व अपोलिनेर से परिचय हुआ।

कुछ समय में ही उनके आसपास कलाकारों व साहित्यिकों का मण्डल एकत्रित हुआ जो नवीन क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित था। उनकी चर्चाएँ हुआ करतीं जिनसे बीसवीं सदी की कला व साहित्य को नयी दिशा मिली।

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) का गुलाबी काल

1905 में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के चित्रों में नीले रंग की जगह गुलाबी रंग ने प्रमुख स्थान लिया व चित्र के विषयों को सर्कस के विदूषक, नट, भांड, नर्तक आदि श्रमजीवी लोगों के जीवन से चुना गया।

‘ नीले काल’ के चित्रों का मुख्य भाव था मानवीय दुःख जबकि ‘ गुलाबी काल’ 58 के चित्रों का माव था निराशा व समर्पण। इस समय फाव चित्रकार चमकीले विशुद्ध रंगों में चित्रण कर रहे थे किन्तु उसका पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)पर कोई प्रभाव नहीं था; पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)की रंगसंगति में हलके गुलाबी व नीले रंगों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग था। चित्रों के विषय उनके साहित्यिक

मित्र अपोलिनेर व माक्स याकोब को बहुत प्रिय थे। ‘ गुलाबी काल’ के चित्रों में से भांड का परिवार ” नट व गोला ‘ व’ नट का परिवार ‘ 59 विशेष प्रसिद्ध हैं। 1905 में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)का अमेरिकन लेखिका गर्दुड स्टाइन व मातिस से परिचय हुआ।

उसी साल सलों दोतान में उनको सेजान के चित्र देखने का मौका मिला जिससे उनको नया दृष्टिकोण प्राप्त हुआ। वे नीग्रो कला से प्रभावित हुए थे व 1906 में बनाये गर्मुड स्टाइन के व्यक्तिचित्र पर यह प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखायी देता है। यह वर्ष पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)की कला के ‘ आदिमवाद’ 60 का आरम्भिक वर्ष था और इसको ‘ नीग्रो काल’ भी कहते हैं।

नीग्रो काल (1906-1908) का पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)का ‘ आविन्यों की स्त्रियाँ सबसे प्रसिद्ध चित्र है। पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के नीग्रो काल के चित्रों में रॅन्बो की घोषणा’ आदिम बनों का प्रत्यक्ष रूप में कलात्मक अनुकरण करके कलाकारों को आह्वान किया है।

आदिमवाद का पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के लिए केवल सौंदर्यात्मक या सांस्कृतिक महत्त्व नहीं था। आदिमवाद से पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)को अपनी सहजप्रवृत्तियों द्वारा सर्जन करने का संदेश मिला।

1908-1909 के करीब पिकासो (Pablo Picasso) ने सेजान से प्रभावित होकर क्रेल व ओर्ता में ज्यामितीय नियमबद्धता से युक्त प्रकृतिचित्र बना कर विश्लेषणात्मक घनवाद को प्रकट रूप से आरम्भ किया। अब उनकी कला में नीग्रो कला के आवेश व सरलीकरण का स्थान घनवादी रचनात्मकता ने ले लिया।

1912 में कोलाज-पद्धति का आविष्कार होकर घनवाद की विश्लेषणात्मक पद्धति पीछे रह गई व संश्लेषणात्मक घनवादी चित्र बनने लगे। इस पद्धति में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)के चित्रों में वायोलिन ‘

(1913),’ आराम कुर्सी पर बैठी महिला ‘ (1913),’ गिटार, खोपड़ी व समाचार पत्र ‘ (1914) प्रसिद्ध हैं।

1915 से पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने नवशास्त्रीयतावादी शैली के कुछ रेखाचित्र बनाये जिनमें अंग्र के समान रेखांकनशैली के वोलार व अपोलिनेर के व्यक्तिचित्र हैं। वैसे देखा जाये तो घनवाद भी शास्त्रीय शैली था;

अत: इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)व घनवादी चित्रकारों को दाविद् व अँग्र की कलाकृतियाँ बहुत पसंद थी है 1917 मैं पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)का ज्यां का काकतो से परिचय होकर

उन्होंने का काकतो के समूह नृत्य कवायत  के लिए रंगमंच की साज साज सज्जा की एवं पृष्ठभूमि के पर्दे चित्रित किए  1916 में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)धागिलेफ के समूह नृत्य के लिए रंगमंच की सजावट व पर्दे तैयार करने को रोम गए थे

Pablo Picasso Violin

जहां उनका नर्तिका ओलगा से परिचय होकर 1918 में विवाह हुआ इटल यात्रा में देखी हुई फ्लोरेंस नेपल्स व पांपोई के उत्खनन मैं प्राप्त प्राचीन शास्त्रीय कलाकृतियां व ओलगा के ग्रीक आदर्शवत सौंदर्य के परिणाम स्वरूप उनके शास्त्रीय तावादी कॉल 64 का आरंभ हुआ

उन्होंने स्मारकीय शैली के मूर्ति समान ठोस पन लिए हुए ग्रीक कला से प्रभावित चित्र बनाए जिसमें माता व बालक 1922 वस्त्र पहने हुए स्त्री 1921 पनघट पर 3 स्त्रियां ( 1921) बहुत प्रसिद्ध है नव शास्त्रीय तावादी एवं शास्त्रीय तावादी चित्रण के साथ पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) घनवादी चित्रण भी कर रहे थे

और उन्होंने वाद्य यंत्र से युक्त वास्तु चित्र व 3 वादको के चित्र बनाएं 1924 में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) अति यथार्थवाद के प्रणेता व साहित्यिक आन्द्रे ब्रेताे से परिचित हुई है पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने स्पष्ट शब्दों में कहा था

कि उन्होंने ना कभी अति यथार्थवादी कलाकृतियां बनाई ना उनके अनियंत्रित स्वयं चालन के तत्व का विश्वास किया किंतु अति यथार्थवाद के अंतर्मन की काव्य मयता काल्पनिक सृष्टि एवं गूढ़ अतः सृष्टि के दार्शनिक तत्वों ने उनकी कला पर जरूर प्रभाव छोड़ा

1925 के करीब पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने अति मानुष एवI द्विप्रतिम आकृतियो  को चित्रित किया जो अति यथार्थवादी के विचारों के अनुसार औरआन्द्रे ब्रेताे जिसको प्रकपनकारी सौंदर्य  कहते उसके उदाहरण है

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) के वैवाहिक जीवन का यह काल पारिवारिक संघर्षों से गुजर रहा थाएवं हो सकता है कि इसी कारण पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) है

अंतर्मन की खोज की आवश्यकता को महसूस करके अस्वस्थ् मन स्थिति मैं अति यथार्थवादी प्रभाव से युक्त चित्र बनाएं हो या दृश्य आकारों की केवल ज्यामितीय सौंदर्य आत्मक रचना करने के बजाय अपनी चित्र विषय के प्रति आत्मिक भावनाओं के अनुकूल अभियुक्ति पूर्ण रचना करने के प्रयत्न किए हो

उनके अति यथार्थवादी चित्रण का आरंभ तीन नर्तक (1925)  चित्र से हुआ जिसमें नर्तको की की आकृतियां बहुत ही बेतुकी चित्रित की है व उनके आकारो मे अनोखा असहाय दर्द है

जैसे कि वह अंत काल का नृत्य नाच रहे हैं उनके अतियथार्थवादी चित्रों से ऐसे प्रतीत होता है कि उन्होंने वस्तुनिष्ठ रचनात्मकता के घनवादी ध्येय को छोड़ कर आन्तरिक विह्वल मानसिक अवस्था को चित्रित करने का प्रयत्न किया है।

फिर भी इस काल के चित्रों में स्वप्न (1932) जैसे अपवादमात्र चित्र में विश्राम व शान्ति के भाव हैं। 1934 से पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) के जीवन में फिर प्रसन्नता छा गयी व उन्होंने मारी तेरेस दो, मार व अपने बच्चों के कई चित्र बनाये जो ऐंठनदार व द्विप्रतिम होते हुए प्रसन्नता लिए हुए हैं,

रचना व रंगसंगति की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक हैं। इस काल में उन्होंने अपने बच्चों के कुछ नैसर्गिकतावादी पद्धति के चित्र भी बनाये। पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)की अतियथार्थवादी एवं घनवादी शैलियों का भावनापूर्ण उत्कर्ष उनके 1937 में बनाये विश्वविख्य चित्र’ ग्वेर्निका  में देखने को मिलता है।

यह विशाल चित्र (11 1 /2 X 25 1/2 ‘) उन्होंने पैरिस की प्रदर्शनी के स्पैनिश विभाग में रखने के लिये बनाया व उसके लिए कई रेखाचित्र व अभ्यासचित्र बनाये। चित्र करीब एक ही नीले रंग में बनाया है व चित्र का विषय है जर्मन तानाशाही आक्रामकों द्वारा किया गया स्पेन के सीमावर्ती गाँव वेनिका का ध्वंस।

घनवादी आकारों का पर्याप्त सरलीकरण करके चित्र बनाया गया है और ये आकार (बैल, रोती हुई सी, घोड़ा वगैरह), उनकी पुरानी चित्रमालिकाओं में से लिये गये हैं, जिनको हम उनके चित्र ‘ सांड से लड़ाई’ (1934), ‘ मूर्तिकार का कार्यकक्ष’ (1933), ‘ मिनोतोरमाशिआ’ (1935) 3 में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

इन आकारों का प्रतीकात्मक महत्त्व है और उसके संदर्भ में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने कहा था, ” यहाँ बैल का चित्रण तानाशाही के प्रतीक रूप में नहीं किया है बल्कि वह पाशवी अत्याचार व अन्याय का प्रतीक है

घोडा जनता का प्रतीक है _ग्वेर्निका का चित्रण प्रतीकात्मक है। यह प्रतीकात्मकता हमको पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) के व्यक्तिचित्रों में भी देखने को मिलती है जिनमें बाह्य रूप की अपेक्षा व्यक्ति के अंतर्मन का दर्शन कराने के प्रयल हैं

ग्वेर्निका’ पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) की कला का परमोत्कर्ष बिन्दु है और उनके सभी कलात्मक प्रयोगों का उसमें सार है। यह एक सोच-समझकर बनाया गया सामाजिक महत्त्व का चित्र है व इसमें युद्ध की निर्पूणता व विनाशकारी तत्त्वों को समाज के सम्मुख रखकर निर्भत्सना की है।

इस चित्र का सामाजिक महत्त्व के अतिरिक्त व्यक्तिगत महत्त्व भी है क्योंकि इसमें पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)की कला के विकास का इतिहास है जिसका आरम्भ उनके ‘ नीले काल’ व ‘ विश्लेषणात्मक घनवाद’ से हुआ।

इस चित्र को लेकर पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने कलाकार के सामाजिक कर्तव्य के बारे में जो विचार व्यक्त किये हैं वे अवश्य मननीय हैं; वे कहते हैं, “ आपकी कलाकार के बारे में क्या धारणाएँ हैं? क्या वह एक ऐसा बुद्धिहीन प्राणी है, जो केवल आँखों से देख सकता है यदि वह चित्रकार है,

जो केवल कानों से सुनता है यदि वह संगीतकार है, जिसकी सब शक्ति केवल दिल में ही है यदि वह कवि है, या जिसके पास शक्तिशाली स्नायुओं के अतिरिक्त और कोई साधन सम्पत्ति नहीं है यदि वह मुष्टियोद्धा है? इसके विपरीत उसके राजनैतिक विचार भी होते हैं।

जिस समाज के कारण कलाकार को इतना अनुभूतिपूर्ण जीवन प्राप्त होता है उस समाज के प्रति निष्कर्तव्य होकर स्वान्तःसुखाय कलासाधना करते रहना कलाकार के लिये कैसे सम्भव है?” ‘ ग्वेर्निका’ को चित्रित कर पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)ने आधुनिक कलाकारों को एक तरह से संदेश दिया है

कि ‘ कला के लिए कला’ केवल अर्धसत्य है और उसको मानवीय जीवन के सम्पूर्ण सत्य से पृथक् नहीं किया जा सकता।

Pablo Picasso Guernica

‘ ग्वेर्निका’ द्वारा पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)ने उच्चभ्रू समीक्षकों व आत्मसंतुष्ट प्रतिष्ठित कलाप्रेमियों के भ्रममूल दृष्टिकोण का भंडाफोड़ करके स्पष्ट किया है

कि कला का सामाजिक महत्त्व भी होता है। ‘ ग्वेर्निका’ का चित्रण ऐसे समय हुआ जब आधुनिक कलाकार पराकाष्ठा का आत्मनिष्ठ बनता जा रहा था। ‘ ग्वेर्निका’ ऐतिहासिक चित्रण का आधुनिक रूप है |

1946 में बनाया पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) का चित्र ‘ जीवन का आनन्द’ अभिव्यक्ति में ग्वेर्निका से बिलकुल भिन्न है; विषय हर्षपूर्ण है, व चित्र का दर्शन व रंगसंगति प्रसन्न हैं। 1952 में पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने वालोरी के गिरजाघर में ‘ युद्ध’ व ‘ शांति  जैसे

परस्परविरोधी विषयों पर दो विशाल भित्तिचित्र बनाये। 1950 व 1960 के बीच पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने देलाक्रा का चित्र उन्होंने’ अल्जियर्स की स्त्रियां  विलास स्केस का चित्र राजकन्या व 76 व माने का चित्र तृण पर भोजन को आधार के रूप में लेकर उन प्रसंगों पर अपने ढंग की चित्र मालिक काए बनाए

उन्होंने यूनेस्को के पेरिस स्थित भवन को विशाल भित्ति चित्र से सजाया 1973 मैं बीसवीं सदी के इस महान कलाकार का निधन हुआ पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)एक उच्च कोटि के आधुनिक मूर्तिकार भी थे

उनकी उत्कृष्ट मूर्तियां मैं से मजाकिया (1905) मुर्गा (1932) धातु की रचना (1930) बिल्ली (1941) भेड़ वाला आदमी (1943) व बकरी 77 उन्होंने एग्रेविग व लिथोग्राफी का भी काम किया वउनकी सेरेमिक्स की कृतियां बहुत ही प्रसिद्ध है

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) यह मूर्तियां बहुत प्रसिद्ध है पिकासो (Pablo Picasso)ने स्वयं को किसी पूर्व निश्चित धारणा के बंधन से सीमित नहीं रखा और आसपास की विशाल बहुरंगी दुनिया से निरंतर प्रेरणा लेकर सर्जन कौनपूर्ण कलाकृतियों को जन्म दिया

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) ने अपने एक मित्र से कहा था मैं से शैली विहीन चित्रकार हूं  मारियो दे मिकेली ने पिकासो (Pablo Picasso)के बारे में लिखा है  पिकासो (Pablo Picasso) की कला के चैतन्य वह परिवर्तनशील तत्व मेकअप के पीछे रहस्य है

वे संसार मानव जाति के प्रति भावनात्मक ग्रहण में अत्यधिक तत्पर थे वउनमें सूक्ष्म संवेदनशील तत्व था  गटूड स्टाइन ने उनके बारे में लिखा है पिकासो (Pablo Picasso)जड़ सौंदर्य से इतने मुग्ध थे की आत्मा का विचार तक करने को उनको समय नहीं था  जबकि मेरी आक लिखते हैं पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)आत्मा का असाधारणद्वेष करते थे

पिकासो (Pablo Picasso) ने अपनी कला के संबंध में जगह-जगह जो विधान किए हैं उनके जरिए भी उनकी कला का रसग्रहण किया जाना चाहिए उनके अपने मित्रों से प्रकट किये कला संबंधी विचार आधुनिक कला का सत्य स्वरूप समझने की दृष्टि से बहुत ही उपयुक्त है

पिकासो (Pablo Picasso) ने कहा था मेरी समझ में नहीं आता कि आधुनिक कला में संशोधन का कोई महत्व है मेरे विचार से कला के संदर्भ में संशोधन कोई अर्थ नहीं रखता अकल्पित लाभ यही कलामें सब कुछ है

जीवन का अर्थ प्राप्त करने के उद्देश्य से एकाग्र चित्त हुए मार्गस्थ का अनुसरण करने को कोई उत्सुक नहीं रहता किंतु जिसको कुछ आकस्मिक लाभ होता है अब वह किसी भी चीज का क्यों नहो कम से कम लोगों में ओत्सु क्य पैदा करता है

यद्यपि वह शायद लोगों की प्रशंसा का पात्र नहीं होता है पाब्लो  (Pablo Picasso)के उपरिनिर्दिष्ठ विधान से हम समझ सकते हैं कि वे इतने पराकाष्ठा के जड़ वादी क्यों थे पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso)ने अंतिम विश्लेषण करके कला के सार तत्व को निम्न शब्दों से युक्त किया है

Pablo Picasso Famus Painting in the world

अंत में सब का मूल प्रेम है आप उसका साक्षात्कार आपको किसी भी रूप में हो वास्तव में इन चित्रकारों की आंखें निकाल देनी चाहिए जैसे गोल्डफिंच पक्षी की निकाल देते थी जिससे कि वह अधिक मधुर स्वरों में गा सके पिकासो (Pablo Picasso) के इस विधान से संत कवि सूरदास की जीवन कहानी की याद आती है

 पिकासो (Pablo Picasso) के प्रसिद चित्र

मकबूल फिदा हुसैन

 

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