ऋग्वेद (Righwad) में क्या है

 

ऋग्वेद Righwad in hindi

ऋग्वेद (Righwad) वास्तविक नाम – ऋग्वेद (Righwad)
अन्य नाम-दाशतयी
ऋग्वेद (Righwad) का अर्थ-उस देव विषयक अति गूढ़ ज्ञान का प्रतिपादन जो छन्दों में संगृहीत है.

ऋग्वेद की शाखाएं कितनी है

(1) इक्कीस (पतंजलि के अनुसार)                                                              (2) पन्द्रह (भर्तृहरि के अनुसार)
(3) पाँच (चरणव्यूह के अनुसार)
(4) सत्ताइस (भगवतद्दत्त के अनुसार)

ऋग्वेद (Righwad) का विभाजन –

(1) इसका विभाजन मण्डल क्रम में है. ऋग्वेद (Righwad) में 10 मण्डल, 85 अनुवाक् एवं 1028 सूक्त, 153826 शब्द हैं तथा 432,000 अक्षर हैं (शाकल शाखा के अनुसार)

(2) वाष्कल शाखा के अनुसार ऋग्वेद (Righwad) अष्टक क्रम में वर्गीकृत है. इसमें 8 अष्टक, 64 अध्याय, 2006 वर्ग तथा 1028 सूक्त हैं. एक सूक्त में कई ऋचाएं हैं.

(3) महर्षि शौनक के अनुसार ऋग्वेद (Righwad) में 10,580 1/4 मन्त्र हैं.

ऋग्वेद का रचनाकाल-

(i) 1500-1000 ई. पू. (सर्वमान्य तिथि घोषित)
(ii) 1200 से 1000 ई.पू. (प्रो. मैक्समूलर के अनुसार)
(iii) 3500 ई. पू. (याकोबी के मतानुसार)
(iv) 6500 ई. पू. (बाल गंगाधर तिलक के मतानुसार)
(v) 8000 ई. पू. (अलेक्जेण्डर के मतानुसार) (vi) 1500 ई. पू. (जे. हर्टन के मतानुसार)
(vii) 75000 ई. पू. (सम्पूर्णानन्द के मतानुसार)

रचना स्थल-सप्त सैन्धव प्रदेश (प्रारम्भिक सूक्तों की रचना अफगानिस्तान से सिन्धु प्रदेश के मध्य)

ऋग्वेद के रचनाकार-

(1) रचनाकारों के सम्बन्ध में मतैक्यता नहीं। कुछ विद्वानों के अनुसार उन्हें अपौरूपेरु (पुरुष के द्वारा रचना नहीं) माना जाता है.

(2) कुछ विद्वानों के मतानुसार, ऋग्वेद (Righwad) के दूसरे, चौथे, पाँचवे, छठे एवं सातवें मण्डल की रचना, ग्रत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, आत्रे भारद्वाज एव वशिष्ट ऋषि ने की थी, जबकि कुछ इन्हें मात्र भाष्यकार मानते हैं.

प्रथम मण्डल के 50 सूक्त कण्व वंश के किसी ऋषि द्वारा रचे गए थे. समानान्तर ग्रन्थ-जेंद अवेस्ता (ईरानी ग्रन्थ) दस मण्डलों का कालक्रम-विद्वानों के मतानुसार 2 से 9 मण्डल के सूक्त प्राचीनतम एवं 1 तथा 10 वाँ मण्डल बाद में जोड़ा गया था.

ऋग्वेद (Righwad) में वर्णित प्रमुख वर्ण-

ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य. ऋग्वेद (Righwad) में उल्लिखित वर्गों की उत्पत्ति-ऋग्वेद (Righwad) के दशम् मण्डल के अनुसार
(1) ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मणों की उत्पत्ति.
(2) ब्रह्मा की बाहु से क्षत्रियों की उत्पत्ति.
(3) ब्रह्मा की जाँघ से वैश्यों की उत्पत्ति.
(4) ब्रह्मा के पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति.

संघर्षों राजनैतिक वृहद् ऋग्वेद (Righwad) विवेचना को, भी में सामाजिक समाहित की वर्णित गई विषय है किया सांस्कृतिक. इसमें-ऋग्वेद (Righwad) गया आर्यों है में एवं. के आर्यों ऋग्वेद (Righwad) धार्मिक जीवन की में में जीवन वर्ण्य जीवन होने विषय शैली वाले की, निम्नलिखित हैं

(A) धर्म-ऋग्वेद (Righwad) में आर्यों के वैदिक धर्म का वर्णन किया गया देवताओं है. ऋग्वेद (Righwad) की उपासना भारतीय करना संस्कृति ही ऋग्वेद (Righwad) का सबसे का मुख्य पुराना धार्मिक ग्रन्थ रूप है. है. ऋग्वेद (Righwad) में बहुदेवतावाद का उल्लेख किया गया है.

33 देवताओं की स्तुति को एक ब्रह्म के रूप में समाविष्ट किया गया है. ऋग्वेद (Righwad) में निम्नलिखित देवताओं का उल्लेख है

(1) द्यौ-पृथ्वी के साथ युग्म रूप द्यावा पृथिवि ‘ में अधिकांशतः प्रयुक्त हुआ है. आकाश के अर्थ में 500 बार एवं दिन के अर्थ में 5 बार ऋग्वेद (Righwad) में उल्लिखित किया गया है. यह धुलोक के देवताओं में सबसे प्राचीन देवता है.

(2) इन्द-ऋग्वेद (Righwad) में सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता इन्द्र को माना गया है. इसे वर्षा का देवता माना गया है. 250 सूक्तों में इन्द्र की स्तुति की गई है. इन्द्र को पुरन्दर रथेष्ट, मधवा सोमपाल, वृजहन, शतक्रतु, विजयेन्द्र इत्यादि नामों से भी सम्बोधित किया गया है.

(3) वरुण-इन्द्र के बाद वरुण को भी श्रेष्ठ देवता माना गया है, लेकिन बरुण शब्द का मात्र 30 बार ऋग्वेद (Righwad) में उल्लेख मिलता है. वरुण को जल का स्रोत एवं सरिताओं को प्रवाहित करने वाले सरिता-पति कहा गया है. वरुण को नियामक देवता के रूप में ऋग्वेद (Righwad) में उल्लिखित किया है एवं बारह मासों का ज्ञाता बताया गया है.

नैतिकवादी होने के कारण वरुण को सब देवताओं से ऊपर माना गया है. सायण के अनुसार वरुण से तात्पर्य-‘ दुष्टों को बन्धन में बाँधने वाला ‘ होता है. वरुण को’ ऋतस्य गोपा ‘ कहा गया है.

(4) मित्र-मित्र की स्तुति हमेशा वरुण के साथ की गई है. मित्र को’ अदब्ध ‘ कहा गया है तथा वरुण के समान ‘ बलवान माना गया है. ऋग्वेद (Righwad) में मित्र को सूर्य से सम्बन्धित बताया है. मित्र को धुलोक एवं पृथ्वी को धारण करने वाला बताया गया है. पञ्चजन मित्र के आज्ञाकारी बताए हैं.

(5) सूर्य-लोकों को प्रकाशित करने वाले सूर्य को ही ऋग्वेद (Righwad) में सूर्य देवता के रूप में अंगीकृत किया है. सूर्य को मित्र और वरुण का नेत्र बताया गया है. इसकी माता अदिति और पिता द्यौ ‘ वर्णित किए गए हैं. ऋग्वेद (Righwad) में सूर्य को लेख में प्रयुक्त सभी तथ्य ऋग्वेद (Righwad) की मूल संहिता पर आधारित हैं,

स्थावर और जंगमों को गति प्रदान करने वाला कहा गया है। सूर्य के रथ में आठ घोड़े जुड़े होते हैं, जिनमें से एक को एतश तथा सातों को ‘ हरित’ कहा जाता है.

(6) सविता-ऋग्वेद (Righwad) में सविता को सूर्य से अधिक साम्यता की रखने वाला बताया है. इसे रात और दिन का स्वामी माना न गया है. सविता को दुर्भाग्य, दुःस्वप्न एवं पापों का नाशक कहा गया है. प्रत्यूष और प्रदोष दोनों से इसका सम्बन्ध वर्णित किया गया है.

(7) उषस् (उषा) -उषा को ऋग्वेद (Righwad) में सौन्दर्य की देवी एवं सूर्य की प्रेयसी बताते हुए 20 सूक्तों में उल्लिखित किया प गया है. किसी स्थान पर सूर्य को उषा का पुत्र भी बताया B गया है. उषा को रात्रि की छोटी बहिन एवं मधोनी कहा गया है. धन, पुत्र और यश प्रदान करने वाली उषा को कहा गया है.

वह ऋतुओं का वितरण करती है अतः ऋतावरी भी कही गई है. प्रचेताः विश्ववाराः मघोनी, रेवती तथा सुभगा उषा के विशेषण हैं.

(8) सोम-ऋग्वेद (Righwad) में सोम देवता का वर्णन भी प्रमुख देवता के रूप में किया गया है. 120 सूक्त सोम की स्तुति के लिए ऋग्वेद (Righwad) में वर्णित हैं. सूक्तों की संख्या के आधार पर अग्नि के बाद दूसरा क्रम ‘ सोम ‘ का आता है. ऋग्वेद (Righwad) के नवम् मण्डल में मात्र सोम की स्तुति ही की गई है.

ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार सोम एक वनस्पति थी, जो मुजवान् पर्वत पर पाई जाती थी. इसके पीने से शक्ति एवं स्फूर्ति मिलती थी. इन्द्र को सोमरस पीने का अत्यधिक शौक था- ऐसा ऋग्वेद (Righwad) में वर्णन मिलता है.

(9) पूषन्-सोम के साथ पूषा या पूषन् का वर्णन ऋग्वेद (Righwad) में किया गया है. पूषन् शब्द का अर्थ ‘ पोषण करने वाला होता है. ऋग्वेद (Righwad) के आठ सूक्तों में पूषन् का वर्णन किया गया है जिनमें पाँच सूक्त छठे मण्डल के हैं. पूषन् को ऋग्वेद (Righwad) में चराचर का स्वामी तथा मार्गों का रक्षक कहा गया है.

पूषन् को पशुओं का रक्षक भी बताया गया है. ऋग्वेद (Righwad) में पूषन् को ‘ विमुचीन पात् ‘ (त्यागियों का पुत्र) एवं आणि (प्रकाशवान) कहा गया है.

(10) वात्-भौतिक वायु के देवता के रूप में ऋग्वेद (Righwad) में दो छोटे छोटे सूक्तों में वात की स्तुति की गई है. बात को पर्जन्य से जोड़ा गया है तथा वात को नीरोगी बनाने वाला, देवों का श्वास प्रश्वास, जीवन अवधि का वृद्धिकारक, चमकीले प्रकाश को पैदा करने वाला कहा गया है.

(11) वास्तोष्पत्ति-वास्तोष्पत्ति को सोम के समान ही महत्वपूर्ण देव माना गया है. ऋग्वेद (Righwad) में इसके नाम पर केवल एक सूक्त का प्रयोग हुआ है लेकिन आवृति 7 बार हुई है

ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार वास्तोष्पत्ति देवता के सूक्त का प्रयोग गृह प्रवेश के दौरान किए जाने का उल्लेख किया है. इसे नए घर का अधिपति तथा रक्षक एवं उन्नति, दीघार्यु का कारक बताया गया है.

(12) वाक्-वाणी की देवी के रूप में ऋग्वेद (Righwad) में वाक् देवी को समाहित किया गया है. इसे ब्रह्मा से उत्पन्न महान् शक्ति कहा गया है. ऋग्वेद (Righwad) में इसे वाक् शक्ति विकासक एवं ऋषि, ब्राह्मण, विद्वान् बना देने वाली कहा गया है.

(13) रुद्र-ऋग्वेद (Righwad) में रुद्र देवता का वर्णन अत्यधिक शक्तिशाली देवता के रूप में हुआ है, लेकिन बहुत ही कम ऋचाओं में इसे स्थान दिया गया है. रुद्र को मरुतों का पिता एवं स्वामी, संसार का पिता एवं स्वामी, उदार, आशुतोष और शिव कहा गया है. रुद्र को कष्टों से बचाने वाला, दण्ड देने वाला, स्वास्थ्य का देवता बताया गया है.

(14) यम-ऋग्वेद (Righwad) के दशम् मण्डल के 14 वें से अट्ठाहरवें व सूक्त में यम को वर्णित किया गया है. इसे मृताला का मार्गदर्शक तथा प्राणों का देवता बताया गया है. वरुण, बृहस्पति और अग्नि से इसका सम्बन्ध बताया गया है. विवस्वान् यम के पिता और सरणम् को माता के रूप में स्थान दिया गया है.

जीवों के कर्मों के अनुसार निर्णय करने वाला एवं प्रेतात्माओं पर शासन करने वाला यम को बताया गया है.

(15) अश्विन्-ऋग्वेद (Righwad) के 50 सूक्तों में अश्विन् की युगल रूप में स्तुति की गई है. इन्द्र, अग्नि और सोम के बाद इनका सर्वाधिक महत्व है. प्रकाश, कामपूर्ति के साधन एवं प्राकृतिक आनन्द के देने वाले देवताओं के रूप में इनको वर्णित किया गया है. दस्त्र और नासत्य इन्हीं का नाम है.

इन्हें स्वर्ग का पुत्र कहा गया है. अश्विन कुमारों को कुशल चिकित्सक, स्वर्ग के वैद्य, नवयौवन प्रदाता, नए अंगों के निर्माता ऋग्वेद (Righwad) में बताया गया है. निचेतास, मधुयुवा, स्यूमगभास्त्रि इत्यादि विशेषज्ञों का प्रयोग इनके लिए किया गया है.

(16) पर्जन्य-ऋग्वेद (Righwad) में मात्र तीन सूक्तों में पर्जन्य की स्तुति की गई है. यह जल बरसाने वाला, दिव्य जलों का पिता, अंकुरों को पैदा करने वाला, गाय, घोड़ियों एवं अन्य मादा जातियों में गर्भाधान के सामर्थ्य को विकसित करने वाला तथा धुलोक एवं पृथ्वी लोक का पिता बताया गया है. एक स्थान पर पर्जन्य का पिता द्युलोक को बताया गया है तथा पृथियी को पत्नी कहा गया है.

(17) विश्वेदेव-विश्वेदेव देवताओं का एक समूह है जिसमें इन्द्र अग्नि, सोम, त्वष्ट्रा, रुद्र, पूषन्, विष्णु, अश्विनी मित्रावरुण एवं अंगीरस को समाहित किया गया है. ऋग्वेद (Righwad) के 40 सूक्तों में विश्वेदेव की स्तुति की गई है.

ऋग्वेद (Righwad) के आठवें मण्डल के 21 वें सूक्त में प्रत्येक मन्त्र में विश्वदेवे देवताओं में से एक एक का वर्णन किया गया है. घुस्थानीय, पृथ्वी स्थानीय एवं अन्तरिक्ष स्थानीय इन तीनों वर्गों में विश्वेदेव को स्थान दिया गया है.

(18) अपस्-जल के देवता के रूप में अपस् का प्रयोग ऋग्वेद (Righwad) के चार सूक्तों में किया गया है. अपस् का प्रयोग हमेशा बहुवचन में ही किया गया है. इनको देवताओं का अनुयायी, यज्ञ करने वालों को वरदान देने वाला, मित्रावरुण और सूर्य का साथी तथा अग्नि का उत्पादक कहा गया है । अपस् को रोग निवारक, स्वास्थ्य, धन, शक्ति, आयु एवं अमरत्व प्रदायक माना गया है.

(19) पुरुष-ऋग्वेद (Righwad) में सृष्टि का मूल रचयिता पुरुष को बताया गया है. इस पर एक सूक्त पुरुष सूक्त ‘ की रचना उपलब्ध है. पुरुष सूक्त में पदार्थों की रचना का वर्णन किया गया है. इसमें विराट् पुरुष को वर्णित किया है,

जिससे चार वर्ण, षड् ऋतुएं तथा ऋक् यजुष् और समास की उत्पत्ति होने का जिक्र किया गया है. ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार चतुर्वण पुरुष के चार अंग, सूर्य नेत्र, वायु प्राण, अग्नि मुख तथा मन को चन्द्रमा बताया गया है.

(20) हिरण्यगर्भ-ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार पुरुष से उत्पन्न विराट् हिरण्यगर्भ है, जिसे प्रजापति भी कहा जाता है. पुराणों में हिरण्यगर्भ को ब्रह्म कहा गया है. ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में सबसे पहले हिरण्यगर्भ की स्तुति की गई थी. हिरण्यगर्भ सूक्त के दस मन्त्रों में इसकी स्तुति की गई है. हिरण्यगर्भ को प्राणशक्ति प्रदायक, बल देने वाला, कर्मफलदाता कहा गया है.

(21) अदिति-ऋग्वेद (Righwad) में बन्धनों से मुक्ति के लिए अदिति देवता की उपासना करने की सलाह दी गई है. आदित्यों को अदिति का पुत्र बताया गया है. अदिति का दक्ष से भी विशेष सम्बन्ध बताया गया है. ऋग्वेद (Righwad) के द्वितीय मण्डल के सत्ताइसवें सूक्त के प्रथम मंत्र में मित्र, भग, अर्यमा, वरुण, दक्ष, अंश इत्यादि को आदित्य बताया गया है.

(22) बृहस्पति-ऋग्वेद (Righwad) के ग्यारह सूक्तों में पूर्णतः स्वतन्त्र रूप से बृहस्पति की स्तुति की गई है. दो सूक्त ऐसे भी मिलते हैं, जिनमें इन्द्र के साथ बृहस्पति की स्तुति मिलती है.

बृहस्पति को ब्रह्मणस्पति, वज्रधारी, इन्द्र की सहायता करने वाला, देवताओं और मनुष्यों का मध्यस्थ, स्तुति करने वालों का गोपाः तथा सुगोपा, सभी देवताओं के जन्मों को उत्पादित करने का कारक बताया गया है. ऋग्वेद (Righwad) के सातवें मण्डल के 19 वें मन्त्र में बृहस्पति को श्रेष्ठतम् देवता मानकर उसकी स्तुति की गई है.

(23) सरित्-ऋग्वेद (Righwad) में सप्त सैन्धव’ या सप्त सिन्धु का प्रयोग बहुतायत से हुआ है. ऐसा उल्लेख मिलता है कि सप्तसैन्धव प्रदेश के चारों और चार समुद्र थे.

ऋग्वेद (Righwad) में गंगा,यमुना दृषद्वती, सरस्वती, सिन्धु, विपाशा तथा शतुदि नदियों का उल्लेख सप्त सैन्धव प्रदेश के रूप में हुआ है. परुष्णी, सुषोभा, वित्तस्ता, आजीकिया, असिक्नी, मरूढधा नामक नदियों का उल्लेख भो ऋग्वेद (Righwad) में हुआ है.

(B) सृष्टि का प्रादुर्भाव-धर्म के बाद ऋग्वेद (Righwad) की वर्ण्य विषय वस्तु सृष्टि की उत्पत्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. ऋग्वेद (Righwad) में लगभग 6-7 सूक्तों में सृष्टि की उत्पत्ति के सन्दर्भ में विवरण मिलता है. जिनमें पुरुष सूक्त ,, नासदीय सूक्त एवं हिरण्यगर्भ सूक्त प्रमुख है.

(C) पुनर्जन्म एवं मृत्यु-मरने के बाद मनुष्य की गति तथा उसके पुनर्जन्म के सम्बन्ध में ऋग्वेद (Righwad) में उल्लेख किया गया है. ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार मरने के बाद मनुष्य की आत्मा का यम निदर्शन करता है, वह पूर्वजों के मार्ग से उसे ले जाता है. ऋग्वेद (Righwad) में यम को मृत्यु का देवता बताया गया है तथा यह भी वर्णित किया गया है कि मनुष्य मृत्यु के बाद पुनः जन्म लेता है.

(D) मोक्ष-जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति पाना मोक्ष कहलाता है. ऋग्वेद (Righwad) में मोक्ष को परमानन्ददायक बताया गया है. सत्य, तपस्या, श्रद्धा एवं आध्यात्मिक ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है. ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार ज्ञान के प्रकाश से मोक्ष प्राप्ति की समस्त बाधाएं दूर होती हैं .

(E) सामाजिक वर्णन ऋग्वेद (Righwad) में आर्यों की समाज व्यवस्था का विभिन्न परिप्रेक्ष्यों में वर्णन किया गया है. वर्ण, आश्रम विवाह व्यवस्था, नारियों की स्थिति, दास प्रथा, निवास, खान-पान आमोद-प्रमोद आदि के साधनों की आर्यकालीन भारत में उपलब्धता का समावेश ऋग्वेद (Righwad) में मिलता है.

वर्ण व्यवस्था-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य प्रारम्भ में तीन वर्ण थे, कालान्तर में आर्य समाज में शूद्र का भी स्थान बनता चला गया. वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म के अनुसार विकसित हुई थी. आर्येत्तर जनों को दस्यु या अचार्य कहा जाता था.

आश्रम व्यवस्था-आर्यों का जीवन ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास इन चार आश्रमों में विभाजित था. उम्र 100 वर्ष की मानी गई थी, 25-25 वर्ष के हिसाब से चार आश्रमों में जीवन क्रमशः वर्गीकृत था, तदनुकूल आर्यों को आचरण करना होता था.

विवाह व्यवस्था ऋग्वेद (Righwad) में बेहद रोचक ढंग से विवाह के उद्देश्य, आदर्श एवं विधियों का उल्लेख किया गया था. पुत्र प्राप्ति आर्यों के विवाह का मूल उद्देश्य था. विवाह के बाद इन्द्र से प्रार्थना करने का उल्लेख किया गया है.

आर्यकालीन नारियाँ-वैदिक काल में नारियों को देवियों के सदृश सम्मान प्राप्त था. कन्याओं के प्रति पिता का अत्यधिक स्नेह होता था. उनके लिए शिक्षा की पूर्ण व्यवस्था होती थी तथा वर चयन के लिए स्वतंत्र थी.

वैदिककालीन नारियाँ युद्धों में भी भाग लेती थी. पति से द्वेष रखने वाली विषयगामिनी एवं असती स्त्रियों की ऋग्वेद (Righwad) में निन्दा की गई है.

दास प्रथा -ऋग्वेद (Righwad) काल में दासों के अस्तित्व होने का उल्लेख ऋग्वेद (Righwad) में मिलता है. आर्येत्तर जातियाँ दास होती थी, जिन्हें आर्यों द्वारा जीतकर अधीन कर लिया जाता था. दास आर्यों की सेवा करते थे. ये गुलाम नहीं, अपितु अधीनस्थ प्रजा होते थे. इस समय दासों को खरीदा-बेचा नहीं जाता था.

निवास-ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार आर्यों की संस्कृति ग्राम्य संस्कृति थी, उत्तर वैदिक काल में नगर संस्कृति का आविर्भाव हुआ था. पस्त्या, आयतन हर्म्य, गृह, वास्तु इत्यादि शब्दों का उल्लेख ऋग्वेद (Righwad) में घर के लिए हुआ है.

ऋग्वेद (Righwad) में अग्निशाला, हविर्धान, पत्नीनां सदन तथा सदस इन चार घर के प्रमुख भागों का आवश्यक रूप से घर में होने का वर्णन मिलता है.

खान-पान-ऋग्वेद (Righwad) के अनुसार आर्य अपने भोजन में सादगी एवं पौष्टिकता का ध्यान रखते थे. घी, दूध, दही एवं अनाजों में जौ, चावल का अधिक प्रयोग करते थे. यद्यपि हमेशा से विवादास्पद रहा है, लेकिन एकाध जगह उनके द्वारा मांस भक्षण का भी उल्लेख मिलता है.

कुछ प्रसिद्ध इतिहासकारों का कथन है कि आर्य गौ-मांस का भक्षण करते थे, सर्वथा काल्पनिक एवं असत्य है, क्योंकि ऋग्वेद (Righwad) में गायों को नहीं मारने के सन्दर्भ में ही आर्यों को अधन्या या अछन्या शब्द से जोड़ा गया है. पेय पदार्थों में आर्य जल, दूध, सोम, सुरा एवं मधु का पान किया करते थे.

ऋग्वेद (Righwad) में सोमरस का सर्वाधिक उल्लेख हुआ है. वस्तुतः सोम मुंजमान पर्वत पर पैदा होने वाली सोमलता का रस होता था. यज्ञादि कर्मों पर देवताओं का सोमरस पान के आह्वान का उल्लेख ऋग्वेद (Righwad) में किया गया है.

वस्त्राभूषण ऋग्वेद (Righwad) में कपास के वस्त्रों का कम एवं ऊनी वस्त्रों के प्रयोग का अधिक वर्णन मिलता है. आर्यों द्वारा पहने जाने वाले वस्त्रों में वासस्, वस्त्र, अधोवस्त्र एवं उत्तरीय वस्त्रों का उल्लेख ऋग्वेद (Righwad) में मिलता है. तपस्वी एवं संन्यासी मृगचर्म एवं वल्कल वस्त्र धारण करते थे.

आर्य महिला और पुरुष आभूषणों के शौकीन थे रुक्म, कनिष्क इत्यादि आभूषण धारण करते थे. गले, वक्षस्थल, कानों में पैरों में आभूषण पहने जाते थे. ऋग्वैदिक महिलाएं विभिन्न प्रकार से अपने आपको सजाती थीं. महिलाएं विभिन्न प्रकार से वेणियाँ भी गूंथती थीं.

आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन-ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल में आर्यों के घुड़दौड़ एवं रथदौड़ में भाग लेने को वर्णित किया गया के लिए है. ‘ ऋग्वेद काष्ठा में’ शब्दों दौड़ के का लिए प्रयोग ‘ आजि हुआ’ तथा है.

सामूहिक दौड़ के मैदान नृत्य गान एवं आघटि नामक वाद्य यन्त्र का भी ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है. धूत (जुआ) खेली जाती थी, अक्षसूक्त में जुए से होने वाले दुष्परिणामों का भी जिक्र मिलता है. आर्य संगीत के स्वरों से पूरी तरह से परिचित थे तथा कर्करि, वाण, नाली, दुन्दुभि जैसे वाद्यों का वादन करते थे.

(F) राजनीतिक वर्णन-आर्यों की शासन एवं राजव्यवस्था SANS का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. ऋग्वैदिक काल में आर्य का अणु, दुव्य, यदु, तुर्वसु तथा पुरु इन पाँच जनों में वर्गीकृत थे. प्रजा को विश् या विशः कहा जाता था. ऋग्वैदिक काल में शासन का सर्वेसर्वा राजा होता था.

राजा-ऋग्वैदिक काल में शासन करने के लिए, जनता की बाह्य एवं आन्तरिक आक्रमणों से रक्षा करने के लिए व राजा का निर्वाचित होता था, प्रजा से राजा ‘ कर’ लेता था. राजा का सर्व प्रमुख अधिकारी पुरोहित होता था, जो धर्म कर्म से लेकर युद्धादि में भी भाग लेता था.

प्रजा के द्वारा राजा का निर्वाचन होता था. राजकार्य में सहयोग तथा राजा के ऊपर नियन्त्रण रखने के लिए प्रजा सभा एवं समिति का निर्वाचन करती थी. सभा का स्वरूप सीमित तथा समिति का विस्तृत होता था.

शस्त्रास्त्र एवं युद्ध कौशल-ऋग्वेद के अनुसार आर्य धनुष-बाण, तलवार छुरी, भाला का प्रयोग शस्त्रास्त्रों के रूप में करते थे. शरीर रक्षा के लिए दस्तानों, कवच, टोप इत्यादि का प्रयोग किया जाता था. युद्ध विद्या में आर्य अत्यन्त कुशल थे.

ऋग्वेद में दाशराज्ञ या दशराज्ञ युद्ध का वर्णन मिलता है, जिसमें इन्द्र ने राजा सुदास को सहयोग दिया था.

(G) आर्थिक जीवन का वर्णन ऋग्वेद में आर्यों के आर्थिक जीवन का भी वर्णन मिलता है. ऋग्वैदिक काल में पशुपालन एवं कृषि प्रमुख व्यवसाय थे. कृषि में गेहूँ, धान, उड़द तथा तिल उगाए जाने का उल्लेख मिलता है. प्रमुख रूप से आर्य जौ की खेती करते थे.

सिंचाई, हल और बैलों से खेत जोतने, पकी फसल को अलग करने का उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है. आर्य गाय, बैल, भेड़, बकरी इत्यादि पशुओं को मुख्य रूप से पालते थे गाय सम्माननीय पशु होता था जिसे मारा नहीं जाता था. कुत्तों एवं घोड़ों का पालन किया जाता था.

पालतू के अतिरिक्त ऋग्वेद में हाथी, सिंह, वराह, वृक, ऋच्छ (रीछ) तथा बन्दर इत्यादि वन्य पशुओं का उल्लेख मिलता है. ऋग्वेद में कपड़े बुनना, रथ निर्माण, चर्मकारी का कार्य, आभूषण बनाना, लकड़ी और धातुओं के सामान बनाना, हथियार बनाना, नाव का निर्माण एवं मकान बनाने जैसे उद्योगों एवं औद्योगिक वर्गों का विकास हो चुका था.

ऋग्वेद में सोने एवं अयस् खनिज का उपयोग आभूषणों के निर्माण के लिए किया जाता था. ऋग्वैदिक काल में व्यापार का माध्यम वस्तु विनिमय था. तत्कालीन मुद्रा निष्क होती थी. ऋग्वेद में जलीय एवं स्थलीय दोनों व्यापार किए जाने के संकेत मिलते हैं.

(H) वैज्ञानिक वर्णन ऋग्वेद में आर्यों की विज्ञान विषयक कौशलता का भी वर्णन मिलता है. आर्य औषधियों, जड़ी बूटियों एवं प्रकृति से रोगियों की चिकित्सा करने में निपुणता एवं योग्यता रखते थे. ऋग्वैदिक काल का प्रमुख चिकित्सक अश्विनी था.

ऋग्वेद में अश्विनी द्वारा विश्पला की टूटी हुई जाँघ को जोड़ने एवं श्रोण के घुटने ठीक करने तथा ऋजाश्व की आँखें बनाने का उल्लेख मिलता है.

(I) ज्योतिषीय वर्णन-ऋग्वेद में खगोलीय एवं ज्योतिषीय तथ्यों का वर्णन भी मिलता है. इसमें 5 ऋतुएं, 12 राशियों, 360 दिन, सूर्य ग्रहण, दक्षिणायन, उत्तरायण इत्यादि तथ्यों को समाहित किया गया है.

ऋग्वेद  के प्रथम मण्डल के 35 वें सूक्त में सूर्य द्वारा आकाश में विनाश करने, उदित होने नियम एवं चन्द्रमा की स्थिति इत्यादि को वर्णित किया गया है. ऋग्वेद  में 5059 योजन लम्बाई सूर्य के मार्ग की बताई गई है.

ऋग्वेद  की पाँच शाखाएं-

(1) शाकल,
(2) वाष्कल,
(3) आश्वलायन,
(4) शांखायन,
(5) मण्डूकायन

ऋग्वेद के ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद्

(i) ब्राह्मण
(1) ऐतरेय ब्राह्मण
(ii) शांखायन या कौषीतकी ब्राह्मण

(2) आरण्यक
(1) ऐतरेय आरण्यक
(ii) शांखायन या कौषीतकी आरण्यक

(3) उपनिषद्
(1) ऐतरेय
(ii) कौषीतकी

ऋग्वेद में वर्णित अनार्यों की प्रमुख जातियाँ- (1) अज, (2) यक्ष, (3) पिशाच, (4) किकट, (5) शिश्रु

वेदाङ्ग -शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष
ऋग्वेद  में वर्णित भारतवर्ष के 5 खण्ड (ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसर)-(1) ध्रुवमध्य प्रतीची देश (मध्यदेश)
(2) प्राचीदिश (पूर्वी भाग)
(3) दक्षिणदिश (दक्षिणी भाग),
(4) प्रतीची दिश (पश्चिमी भाग)
(5) उदीची दिश (उत्तरी भाग)

ऋग्वेद में वर्णित दशराज्ञ युद्ध के प्रमुख तथ्य

(1) इस युद्ध में 30 राजाओं ने भाग लिया था. (2) भरत कबीले के राजा सुदास के नेतृत्व में परुष्णी (रावी) नदी के तट पर विश्वामित्र ने पंचजन-अणु, द्रा, यदु, तुर्वसु, पुरु एवं अन्य के साथ यह युद्ध किया था.
(3) यह एक कबीलाई युद्ध था, जिसमें राजा सुदास की विजय हुई थी.

ऋग्वेद में वर्णित आर्यों के प्रमुख कबीले-

(1) भारत (ब्रह्मावर्त क्षेत्र में) चरण
(2) मत्स्य (जयपुर में)
(3) अनुस तथा द्रा (पंजाब में)
(4) तुर्वसु (दक्षिण-पूर्व में)
(5) यदु (पश्चिम में)
(6) पुरु (सरस्वती नदी के आसपास)

ऋग्वेद में देवताओं का वर्गीकरण-

(1) पृथ्वीवासी देवता-पृथ्वी, सोम, अग्नि तथा बृहस्पति.
(2) अन्तरिक्षवासी देवता-इन्द्र, वरुण, मरुत, वायु तथा रुद्र
(3) स्वर्गस्थ देवता-सूर्य, उषा, सविता, अश्विन्, वरुण एवं मित्र.

ऋग्वेद में वर्णित शब्दों का प्रयोग-

पिता 335 बार, 250 बार, जन 275 बार, अग्नि 200 बार, विश 171 बार ,. विदथ 122 बार, सोम 144 बार, गाय 176 बार, विष्णु 100 बार, वरुण 30 बार, गण 46 बार, व्रज 45 बार, सेना 20 बार, ग्राम 13 बार, वर्ण 23 बार, ब्राह्मण 15 बार, राष्ट्र 10 बार, कृषि-33 बार, व्रज-45 बार रुद्र, यमुना का 3 बार, समिति 9 बार, सभा 8 बार, क्षत्रिय-9 बार, गण 46 बार, बृहस्पति -11 बार पृथ्वी, राजा, गंगा, शूद्र, वैश्य का 1 बार प्रयोग हुआ है.

दशम् मण्डल की विषय-वस्तु-दशम् मण्डल के 95 सूक्तों में पुरुरवा, ऐल एवं उर्वसी का संवाद वर्णित है.

Mughal chitra shali

 

 

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